Holika dahan ki katha in hindi: जब फाल्गुन की पूर्णिमा आती है, तब लोग श्रद्धा से होलिका जलाते हैं, इस उत्सव के पीछे सत्य की जीत और बुराई के अंत की एक महान कहानी है। इन्हीं में से एक सबसे लोकप्रिय कथा है, भक्त प्रह्लाद और होलिका दहन की कथा (Holika dahan ki katha) यह कहानी केवल एक राजा और उसके पुत्र के संघर्ष की नहीं है, बल्कि यह अटूट विश्वास, निडर भक्ति और अहंकार के विनाश की गाथा है। आइए, विस्तार से जानते हैं कि क्यों हज़ारों साल बाद भी प्रह्लाद की यह कथा हर घर में बड़े गर्व के साथ सुनाई जाती है।
Holika dahan ki katha in hindi | bhakt prahlad ki kahani in hindi
बहुत प्राचीन काल की बात है। पृथ्वी पर एक महान असुर राजा का राज्य था, जिसका नाम हिरण्यकश्यप था। वह अत्यंत शक्तिशाली, अभिमानी और अहंकार से भरा हुआ था। उसने वर्षों तक घोर तपस्या करके ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया और उनसे ऐसा वरदान प्राप्त कर लिया था कि न तो कोई मनुष्य उसे मार सके, न कोई पशु, न दिन में, न रात में, न धरती पर, न आकाश में, न किसी अस्त्र से, न शस्त्र से। इस वरदान को पाकर हिरण्यकश्यप का अहंकार सातवें आसमान पर पहुँच गया।
उसने सोचा कि अब संसार में उससे बड़ा कोई नहीं है। धीरे-धीरे उसका मन इतना विकृत हो गया कि उसने स्वयं को ही भगवान मान लिया। उसने अपने राज्य में घोषणा करवा दी कि अब कोई भी विष्णु का नाम नहीं लेगा, कोई भी देवताओं की पूजा नहीं करेगा। सबको केवल उसी की आराधना करनी होगी। जो उसके आदेश का पालन न करे, उसे कठोर दंड दिया जाएगा।
हिरण्यकश्यप का एक पुत्र था—प्रह्लाद। प्रह्लाद बचपन से ही अत्यंत शांत, सरल, दयालु और भगवान विष्णु का परम भक्त था। जब वह बहुत छोटा था, तभी से उसके मुख से “नारायण, नारायण” का नाम निकलता रहता था। वह खेलते समय, सोते समय, खाते समय-हर समय भगवान का स्मरण करता रहता था।
जब प्रह्लाद बड़ा होने लगा, तब हिरण्यकश्यप ने उसे गुरुकुल भेजा ताकि वह राजनीति, युद्ध और राज्य संचालन की शिक्षा ले सके। गुरु उसे असुर-विद्या सिखाते थे, लेकिन प्रह्लाद का मन उन सब बातों में नहीं लगता था। वह हर समय भगवान विष्णु के गुण गाता रहता था।
एक दिन गुरु ने उससे पूछा, “प्रह्लाद, तुमने अब तक क्या सीखा?”
प्रह्लाद ने सरलता से उत्तर दिया, “मैंने सीखा है कि इस संसार में केवल भगवान नारायण ही सत्य हैं। वही पालनकर्ता हैं, वही रक्षक हैं।”
गुरु यह सुनकर घबरा गए। उन्होंने सोचा कि यदि राजा को यह बात पता चली तो बड़ा अनर्थ होगा। फिर भी बात छिप नहीं सकी।
जब हिरण्यकश्यप को पता चला कि उसका पुत्र उसी विष्णु का भक्त है, जिससे वह सबसे अधिक घृणा करता है, तो वह क्रोध से काँप उठा। उसने प्रह्लाद को दरबार में बुलवाया और कठोर स्वर में पूछा, “तू किसकी भक्ति करता है?”
प्रह्लाद ने निडर होकर कहा, “पिताजी, मैं भगवान विष्णु की भक्ति करता हूँ। वही इस संसार के स्वामी हैं।”
यह सुनते ही हिरण्यकश्यप की आँखें लाल हो गईं। उसने क्रोधित होकर कहा, “मैं ही इस संसार का स्वामी हूँ! तू मेरी आज्ञा का अपमान करता है?”
प्रह्लाद ने विनम्रता से कहा, “आप मेरे पिता हैं, मैं आपका सम्मान करता हूँ, लेकिन सत्य यही है कि भगवान ही सर्वोच्च हैं।”
हिरण्यकश्यप को यह सहन नहीं हुआ। उसने अनेक बार प्रह्लाद को समझाने की कोशिश की, डराने की कोशिश की, लेकिन प्रह्लाद अपने विश्वास से कभी नहीं डिगा। अंत में हिरण्यकश्यप ने निश्चय कर लिया कि वह अपने ही पुत्र का अंत कर देगा।
पहले उसने प्रह्लाद को ऊँचे पहाड़ से नीचे फिंकवा दिया। लेकिन भगवान की कृपा से वह सुरक्षित बच गया। फिर उसे समुद्र में डलवा दिया, परंतु लहरों ने उसे किनारे पहुँचा दिया। फिर उसे हाथियों से कुचलवाने की कोशिश की गई, पर हाथी उसके पास जाकर शांत हो गए। हर बार जब प्रह्लाद बच जाता, तो उसका विश्वास और मजबूत हो जाता।
अब हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को बुलाया। होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में नहीं जल सकती। उसके पास एक दिव्य वस्त्र भी था, जो उसे अग्नि से बचाता था।
हिरण्यकश्यप ने कहा, “बहन, तू इस बालक को गोद में लेकर आग में बैठ जा। तू सुरक्षित रहेगी और यह नष्ट हो जाएगा।”
होलिका को भी अहंकार था। उसने सोचा कि उसे कुछ नहीं होगा। उसने प्रह्लाद को गोद में लिया और विशाल अग्निकुंड में बैठ गई। चारों ओर लकड़ियाँ जलाई गईं। आग भड़क उठी। लपटें आकाश तक उठने लगीं। प्रह्लाद उस समय भी डर नहीं रहा था। वह आँखें बंद करके भगवान विष्णु का नाम जप रहा था। उसके मुख से लगातार “नारायण, नारायण” निकल रहा था।
जैसे-जैसे आग बढ़ी, वैसे-वैसे चमत्कार हुआ। होलिका का दिव्य वस्त्र उड़कर प्रह्लाद को ढक गया और होलिका स्वयं जलने लगी। कुछ ही क्षणों में होलिका भस्म हो गई और प्रह्लाद सुरक्षित बाहर निकल आया। यह देखकर सारी प्रजा आश्चर्यचकित रह गई। सब समझ गए कि यह भगवान की लीला है।
हिरण्यकश्यप का क्रोध अब सीमा पार कर गया। उसने चिल्लाकर कहा, “यदि तेरा विष्णु इतना ही शक्तिशाली है, तो बता, वह कहाँ है?”
प्रह्लाद ने कहा, “वे हर जगह हैं- इस स्तंभ में भी, इस आकाश में भी, इस धरती में भी।”
हिरण्यकश्यप ने क्रोध में आकर खंभे पर प्रहार किया। उसी क्षण एक भयानक गर्जना हुई। खंभा फट गया और उसमें से भगवान नरसिंह प्रकट हुए- आधे सिंह, आधे मनुष्य। न दिन था, न रात। न वे मनुष्य थे, न पशु। उन्होंने हिरण्यकश्यप को अपनी गोद में उठाया, द्वार की देहरी पर रखा और अपने नाखूनों से उसका वध कर दिया।
इस प्रकार भगवान ने अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा की। हिरण्यकश्यप के अंत के बाद राज्य में शांति स्थापित हुई। प्रह्लाद राजा बने और उन्होंने धर्म, सत्य और भक्ति के मार्ग पर शासन किया।
होलिका के जलने और प्रह्लाद के बचने की यह घटना फाल्गुन पूर्णिमा की रात हुई थी। उसी दिन से यह परंपरा बनी कि हर वर्ष उस रात होलिका दहन किया जाए। यह केवल लकड़ी जलाने की परंपरा नहीं है। यह प्रतीक है- अहंकार, अधर्म, ईर्ष्या और पाप के जलने का।
अगले दिन लोग रंगों से होली खेलते हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि जब बुराई जल जाती है, तब जीवन में प्रेम, आनंद और सौहार्द के रंग भर जाते हैं। प्रह्लाद का जीवन यह सिखाता है कि चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ आएँ, यदि मन में सच्ची भक्ति, सच्चाई और विश्वास हो, तो भगवान स्वयं रक्षा करते हैं।
समय बीतता गया। पीढ़ियाँ बदलती गईं। लेकिन यह कथा लोगों के हृदय में जीवित रही। संत-महात्मा इसे सुनाते रहे, माता-पिता इसे बच्चों को सुनाते रहे। लोगों ने समझा कि होली केवल रंगों का पर्व नहीं है, यह आत्मा की शुद्धि का पर्व है। यह याद दिलाता है कि सत्य अंत में जीतता है और अहंकार अंत में जल जाता है।
जब भी होलिका की अग्नि जलती है, तो उसमें केवल लकड़ी नहीं जलती- उसमें मनुष्य के भीतर का क्रोध, लोभ, द्वेष और अहंकार भी जलने का संकल्प लिया जाता है। प्रह्लाद की तरह जो व्यक्ति अपने धर्म पर अडिग रहता है, उसके लिए स्वयं ईश्वर मार्ग बना देते हैं।
इसलिए आज भी जब फाल्गुन की पूर्णिमा आती है, लोग श्रद्धा से होलिका जलाते हैं और मन ही मन प्रह्लाद को याद करते हैं। वे याद करते हैं उस बालक को, जिसने अपने पिता के अत्याचार सहकर भी भगवान का मार्ग नहीं छोड़ा। वे याद करते हैं उस विश्वास को, जो आग में भी नहीं जला। वे याद करते हैं उस प्रेम को, जो मृत्यु से भी बड़ा था।
और इसी स्मृति के साथ, अगले दिन वे रंग लगाकर कहते हैं-
“बुराई जले, अच्छाई फले, प्रेम बढ़े, द्वेष घटे, जीवन रंगों से भर जाए।”
यही है होली की शाश्वत कथा। यही है प्रह्लाद की अमर गाथा। यही है सत्य की अनंत विजय।
(डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी विभिन्न ज्योतिषीय गणनाओं, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं पर आधारित है। हिन्दीसनातन इस जानकारी की सत्यता या सटीकता का दावा नहीं करता है। पाठकों से अनुरोध है कि इसे केवल जानकारी के रूप में लें और किसी भी धार्मिक या आध्यात्मिक निर्णय से पहले विशेषज्ञ की सलाह लें।)


















