16 somvar vrat katha 2026- सोलह सोमवार व्रत को हिंदू धर्म में सबसे फलदायी और कठिन व्रतों में गिना जाता है। यह व्रत लगातार सोलह सोमवार तक बिना कोई सोमवार छोड़े रखा जाता है, और सत्रहवें सोमवार को इसका विधिपूर्वक उद्यापन (समापन) किया जाता है। इसे शुरू करने के लिए सावन का महीना सबसे उत्तम माना जाता है, हालांकि वर्ष के किसी भी सोमवार से इसे आरंभ किया जा सकता है। आइए जानते है व्रत कथा, नियम और उद्यापन विधि के बारे मे।
सोलह सोमवार व्रत की कथा (16 somvar vrat katha 2026)
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार भगवान शिव पृथ्वी लोक का भ्रमण करने की इच्छा से माता पार्वती के साथ अमरावती नामक एक अत्यंत सुंदर नगरी में पहुंचे। वह नगरी हर प्रकार के सुख-वैभव से परिपूर्ण थी, और वहां के राजा ने एक भव्य शिव मंदिर बनवाया हुआ था। भगवान शिव और माता पार्वती कुछ समय के लिए उसी मंदिर में निवास करने लगे।
एक दिन माता पार्वती ने प्रसन्न मुद्रा में बैठे भगवान शिव से पूछा — “हे नाथ, संसार में ऐसा कौन सा व्रत है जो सरलता से किया जा सके और भक्तों को शीघ्र फल भी प्रदान करे?” भगवान शिव ने उत्तर दिया — “देवी, सभी व्रतों में सोलह सोमवार का व्रत सबसे श्रेष्ठ और शीघ्र फलदायी है। जो भी श्रद्धा से इसे करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं।”
संयोगवश, उसी मंदिर का पुजारी यह सारी बातचीत छिपकर सुन रहा था। यह सुनकर उसने भी मन में संकल्प ले लिया कि वह भी यह व्रत करेगा। परंतु दुर्भाग्य से, व्रत आरंभ करने से पहले ही उसे कुष्ठ रोग (कोढ़) हो गया। नगरवासी उससे दूरी बनाने लगे, और यह बात राजा तक भी पहुंच गई। राजा ने यह सोचकर कि यह किसी पाप के कारण हुआ है, पुजारी को मंदिर से हटाकर किसी दूसरे व्यक्ति को पुजारी नियुक्त कर दिया।
अपमानित और असहाय पुजारी मंदिर के बाहर बैठकर भिक्षा मांगकर जीवन यापन करने लगा। कुछ समय पश्चात, उसी मंदिर में कुछ अप्सराएं पूजा करने आईं। उन्होंने कोढ़ग्रस्त पुजारी की दयनीय स्थिति देखी और उसका कारण पूछा। पुजारी ने बिना संकोच अपनी पूरी व्यथा सुना दी।
अप्सराओं को उस पर दया आई, और उन्होंने उसे बताया कि उन्होंने स्वयं सोलह सोमवार का व्रत रखकर अपने कष्ट दूर किए हैं। उन्होंने पुजारी को समझाया कि यदि वह भी श्रद्धापूर्वक यह व्रत करे, तो भगवान शिव उसके सभी रोग और कष्ट दूर कर देंगे। पुजारी ने उत्सुकतापूर्वक व्रत की पूरी विधि पूछी, और अप्सराओं ने उसे संकल्प, पूजा और कथा-श्रवण की संपूर्ण प्रक्रिया विस्तार से समझाई।
पुजारी ने पूर्ण निष्ठा से सोलह सोमवार तक यह व्रत किया। व्रत पूर्ण होते ही भगवान शिव की कृपा से उसका कुष्ठ रोग पूरी तरह समाप्त हो गया और उसका शरीर पहले से भी अधिक सुंदर और स्वस्थ हो गया। यह चमत्कार देखकर राजा और नगरवासी आश्चर्यचकित रह गए, और राजा ने अपनी भूल स्वीकार करते हुए पुजारी को पुनः सम्मानपूर्वक मंदिर में वापिस पुजारी नियुक्त किया।
इसी कथा के प्रचलन से यह मान्यता बनी कि सोलह सोमवार व्रत असाध्य रोगों, संकटों और बाधाओं को दूर करने में अत्यंत प्रभावशाली है, और आज भी अनेक भक्त संतान प्राप्ति, विवाह में आ रही अड़चन, स्वास्थ्य लाभ और मनचाहे जीवनसाथी की कामना से यह व्रत श्रद्धापूर्वक करते हैं।
16 सोमवार व्रत कथा विधि
व्रत आरंभ करने से पहले किसी शुभ सोमवार को प्रातः स्नान करके शिवलिंग के समक्ष विधिवत संकल्प लिया जाता है, कि व्रती लगातार सोलह सोमवार तक बिना कोई सोमवार छोड़े यह व्रत करेगा। इसके बाद प्रत्येक सोमवार को स्नान के पश्चात शिवलिंग पर जल और पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) अर्पित किया जाता है, साथ में बेलपत्र, धतूरा और सफेद पुष्प भी चढ़ाए जाते हैं।
“ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करते हुए दीपक प्रज्ज्वलित करें और शिव जी को गुड़-आटे से बने चूरमे का भोग अर्पित करें। पूजा के समापन पर सोलह सोमवार व्रत की कथा अवश्य पढ़ें या सुनें, उसके बाद शिव आरती करके प्रसाद तीन बराबर भागों में बांटें एक भाग भगवान को अर्पित करें, दूसरा भाग परिवार या अन्य लोगों को बांटें, और तीसरा भाग स्वयं ग्रहण करके व्रत खोलें।
सोलह सोमवार व्रत में बरते जाने वाले नियम
इस व्रत की सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह है कि सोलहों सोमवार बिना कोई सोमवार छोड़े पूरे किए जाने चाहिए। यदि बीच में कोई सोमवार छूट जाता है, तो पारंपरिक मान्यता के अनुसार व्रत की गिनती दोबारा शुरुआत से करनी पड़ती है। व्रत के दौरान फलाहार ही ग्रहण करें – फल, दूध और सेंधा नमक से बने व्यंजन उपयुक्त माने जाते हैं, जबकि अनाज, सामान्य नमक, प्याज और लहसुन का सेवन वर्जित है। इसके अलावा झूठ बोलने, किसी की निंदा करने और मन में द्वेष रखने से भी बचना चाहिए।
उद्यापन विधि (16 somvar vrat katha ka udyapan)
सोलह सोमवार पूर्ण होने के बाद सत्रहवें सोमवार को उद्यापन किया जाता है। इस दिन विधिवत शिव-पार्वती पूजन करके हवन संपन्न किया जाता है। यथासंभव ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा दी जाती है, और स्वयं व्रती भी प्रसाद ग्रहण करके व्रत का विधिवत समापन करता है। उद्यापन के बिना व्रत को पूर्ण नहीं माना जाता, इसलिए इसे किसी शुभ मुहूर्त में करना उचित रहता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
प्रश्न: सोलह सोमवार व्रत कब से शुरू करना चाहिए?
उत्तर: सावन के किसी भी सोमवार से इसे शुरू करना सर्वोत्तम माना जाता है, हालांकि वर्ष के किसी भी सोमवार से भी इसकी शुरुआत की जा सकती है।
प्रश्न: क्या बीच में एक सोमवार छूट जाए तो क्या होगा?
उत्तर: पारंपरिक मान्यता के अनुसार एक भी सोमवार छूटने पर व्रत की गिनती नए सिरे से शुरू करनी पड़ती है।
प्रश्न: उद्यापन क्यों जरूरी है?
उत्तर: उद्यापन के बिना व्रत अधूरा माना जाता है; यह व्रत के संकल्प को विधिवत पूर्ण करने की अंतिम रस्म है।
(Disclaimer: इस लेख में दी गई कथा, विधि और नियम पौराणिक मान्यताओं और परंपरागत धार्मिक स्रोतों पर आधारित हैं। हिन्दीसनातन इनकी ऐतिहासिक सत्यता का दावा नहीं करता। पाठक इसे आस्था और परंपरा के रूप में लें, और किसी भी व्रत को शुरू करने से पहले अपने पारिवारिक पुरोहित या विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें।)
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