Popa Bai Ki Kahani (धर्मराज जी और पोपा बाई की कहानी)

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Published On: जनवरी 12, 2026
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Popa Bai Ki Kahani

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वेसे तो आपने अलग-अलग व्रत कहानी सुनी होगी लेकिन, सभी सुखों को पाकर अंत में स्वर्ग की कामना रखने वाले स्त्री ओर पुरुषों को अपने जीवन में एक बार धर्मराज व उनकी धर्म बहन धर्मराज जी पोपा बाई की कहानी (Dharmraj or Popa Bai Ki Kahani) अवश्य सुननी चाहिए, आज हम धर्मराज व उनकी बहन पोपा बाई की कहानी सुनने के साथ ही अंत में इस कहानी को सुनने का महात्म व उजमन का तरीका भी जानेंगे।

धर्मराज की कहानी

तो एक गुणवती नाम की ब्राह्मणी थी, वह नित्य पूजा पाठ व दान पुण्य किया करती सभी देवों का पूजन करती अतिथि सत्कार करती गांव में उसका बहुत सम्मान था, उसके चार बेटे बहुएं वे अनेकों पौत्र थे घर में खूब धन था तथा सभी आपस में मिल जुलकर प्रेम से रहते थे संक्रांति से ठीक सात दिन पूर्व ब्राह्मणी की मृत्यु हो गई।

सभी उसके भाग्य की सराहना कर रहे थे, कि कैसे गुणवती ने जीवन में अच्छे कार्य किए और भरा पूरा परिवार छोड़कर सुहागन रूप में बैकुंठ को गई है, गुणवती की आत्मा को लेने जो यमदूत आए वे गुणवती को देखकर आश्चर्य में पड़ गए और बोले माई तेरा तेज अलौकिक है, तेरे द्वारा किए गए शुभ कर्मों का प्रभाव हम स्पष्ट देख पा रहे हैं, लेकिन ऐसा क्या हुआ है ऐसी कौन सी गलती तुझसे बन गई कि हम यम दूतों के साथ तुझे मृत्यु यात्रा करनी पड़ रही है।

गुणवती भी आश्चर्य में भरकर उनके साथ चल पड़ी रास्ते में सर्वप्रथम वैतरणी नदी मिली यम दूतों ने कहा “हे मां तूने गौ दान किया है या गौ के लिए कुछ भी किया हो तो उसे याद कर वही तुझे इस वैतरणी से पार लगाएंगी” गुणवती ने मुस्कुराकर अपने द्वारा किए गए गौ दान गौ ग्रास के दान को याद किया तो अचानक एक सुंदर सी गाय ने आकर उसे बड़े आराम से वैतरणी से पार उतार दिया थोड़ा चलते ही गुणवती को भूख और प्यास सताने लगी तो उसने अपने अन्नदान और जल दन को याद किया ऐसा करते ही उसकी भूख प्यास मिट गई, रास्ते में अलग-अलग नरकों के मार्ग आए जिनमें कहीं कांटों के जंगल कहीं चिलचिलाती धूप कहीं कीड़ों का काटना तो कहीं चील कौओं का नोचना हो रहा था।

जैसे ही गुणवती को कांटे दिखे उसने अपने खड़ाऊ चप्पल के दान को, धूप सताने लगी तो छाता कपड़ों के दान को, कीड़े काटने लगे तो चीटियों के भोजन को, चील कौए नौच दिखे तो श्राद्ध पक्ष की काक बली को, पक्षियों को डाले गए अनाज के दानों को याद किया और बड़ी प्रसन्नता से वह सब नरकों से गुजर कर धर्मराज के महल तक पहुंच गई, महल में सोने के सिंहासन पर भगवान नारायण के स्वरूप में धर्मराज जो धरती के मानवों का न्याय कर रहे थे।

गुणवती को देखकर धर्मराज ने बड़े प्रेम से उसका स्वागत किया उसे बैठने को दिया फिर गुणवती ने हाथ जोड़कर धर्मराज भगवान से अपना अपराध पूछा धर्मराज जी ने कहा “हे गुणवती तुम अत्यंत पुण्यात्मा स्त्री हो तुमने अपने जीवन काल तथा पहले के जन्मों में भी पुण्य ही किए हैं, लेकिन तुमने कभी भी मेरी तथा मेरी बहन पोपा बाई की कथा नहीं सुनी मैं धर्मराज भगवान नारायण का ही स्वरूप हूं तथा व्यक्ति के धर्म अधर्म का लेखा रखता हूं, व्यक्ति यदि मेरे प्रति आस्था नहीं रखता मेरी पूजा आराधना नहीं करता मेरी बहन पोपा बाई उसे स्वर्ग में जाने का रास्ता नहीं देती”।

यह सुनकर गुणवती ने धर्मराज भगवान से पुनः सात दिन के लिए धरती पर भेजने हेतु प्रार्थना की ताकि वह धर्मराज व पोपा बाई की कहानी सुनकर उजमन कर वापस आ सके, पुण्यात्मा गुणवती को धर्मराज ने पुनः धरती पर जाने की आज्ञा दे दी गुणवती के जीवित होने की खुशी में पूरा गांव खुशी से झूम उठा लेकिन गुणवती ने उन्हें अपने आने का कारण बताया और हाथ में गेहूं के दाने लेकर सबको धर्मराज व पोपा बाई की कथा सुनाने लगी।

पहले दिन की कथा के पश्चात उन गेहूं के दानों को लेकर वह सबसे पहले अपनी बड़ी बहू के पास गई ओर कहा “बेटा यह गेहूं के दाने तिजोरी में रख दे” तो बड़ी बहू बोली मांजी अभी मैं काम में लगी हूं कहीं भी रख दो, तो गुणवती दूसरी बहू के पास गई उसने आव देखा ना ताव और गेहूं के कुछ दाने लेकर मुंह में डाल लिए, ओए बोली कि माता जी इन गेहूं के दानों में ऐसी क्या विशेषता है हमारे घर में खूब अनाज भरा पड़ा है, कहीं से भी उठाकर तिजोरी में रख दूंगी बचे हुए दाने लेकर गुणवती फिर तीसरी बहू के पास गई तो उसने पास ही खड़े अपने भाई को वे गेहूं के दाने दे दिए और कहा “भाई मुझसे चीजें खो जाती हैं तू ही इन्हे संभाल” अंत में गुणवती ने छोटी बहू को कुछ बचे हुए गेहूं के दाने ले जाकर दिए उस बहू ने उन गेहूं के दानों को लेकर श्रद्धा भाव से लाल कपड़े में बांधकर तिजोरी में संभाल कर रख दिया।

सातवें दिन गुणवती जब उजमन करने बैठी तो उसने धर्मराज तथा पोपा बाई का उजमन उनके द्वारा ही बताई गई विधि से धूमधाम से किया कार्यक्रम संपन्न होने के बाद गुणवती ने सभी से कहा कि संसार में सभी सुख और अंत में बैकुंठ को देने वाली यह कथा साल भर सभी को सुननी चाहिए इस कथा को कहने-सुनने ओर हुंकारा भरने व विधि पूर्वक उद्यापन करने वाला स्वर्ग पाता है, इन गेहूं के दानों को साल भर संभालकर पूजा घर अथवा तिजोरी में रखें, ऐसा करने से धन धान्य से घर भरा रहता है परिवार पर कोई विपदा या बीमारियां नहीं आती।

फिर गुणवती ने बताया की मैंने मेरी बड़ी बहू को यह गेहूं के दाने दिए तो उसने इन गेहूं को दानों को कहीं भी रखने को कहा तो पिछले सात दिन से इसकी संपत्ति का खूब घाटा हुआ दूसरी ने पवित्र दानों को मुंह में चबा गई तो सात दिन से बिस्तर पर पड़ी है, तीसरी ने दाने अपने भाई को दिए तो सब संपदा मायके को चली गई मेरी सबसे छोटी बहू ने इन दानों को बड़ी श्रद्धा से संभाल कर रखा तभी से इसके घर में धन की वर्षा हो रही है, और चारों ओर से शुभ समाचार आ रहे हैं ऐसा है धर्मराज की कहानी का प्रभाव।

धर्मराज जी पोपा बाई की कहानी (Dharmraj aur popa bai ki kahani)

अब आप लोगों को धर्मराज की धर्म बहन popa bai ki kahani सुनाते है, पोपा बाई एक बहुत धार्मिक कन्या थी, उसके माता-पिता स्वर्गवासी हो चुके थे, वह अपने भाई-भाभी के साथ रहती थी एक दिन पोपा बाई के भाई ने अपनी पत्नी से कहा यह पोपा बाई सारा दिन पूजा पाठ में लगी रहती है इसको घर का काम सिखाओ इसे पराया घर जाना है, ऐसा ही चलता रहा तो इससे कौन विवाह करेगा तो भाभी ने पोपा बाई को समझाया कि घर का काम सीखो ताकि तुम्हारा शीघ्र विवाह हो जाए यह सुनकर पोपा बाई ने कहा भाभी मैंने तो पहले ही मन ही मन भगवान विष्णु को ही अपना पति मान लिया है, मैं अब किसी और से विवाह नहीं कर सकती मुझे गांव के बाहर एक झोपड़ी डाल दो मैं गांव के लोगों की गाय चरा लाया करूंगी मांग कर कुछ भी खा लूंगी बस भगवान के सिवा आज के बाद किसी पर पुरुष का मुख नहीं देखूंगी।

अब पोपा बाई इसी प्रकार जीवन यापन करने लगी एक दिन उस नगर का राजा वहां से होकर गुजरा पोपा बाईके मधुर भजनों की आवाज सुनकर वह कुटिया के पास पहुंच गया पोपा बाई ने कहा “कौन हो आगे चले जाओ मैं पराए पुरुष का मुख नहीं देखती” लेकिन अहंकारी राजा ने दरवाजा तोड़ दिया और जबरदस्ती पोपा बाई को उठाकर महलों में ले गया, रानियों ने पोपा बाईके बारे मे पहले ही सुन रखी थी वे घबराकर राजा से बोली यह पवित्र पोपा बाई है, इसे अभी छोड़कर आए नहीं तो हमारा राज्य नष्ट हो जाएगा राजा यह सुनकर घबरा गया और पोपा बाई को छोड़ने चला गया पर इतने में ही पाप की नदी आई और राजा और उसके राजपाट को बहाकर ले गई पर पुरुष के दर्शन से दुखी पोपा बाई ने भी वहीं अपने प्राण त्याग दिए।

पोपा बाई का धर्म के प्रति ऐसा समर्पण देख धर्मराज ने धर्मप्रीत व धर्म परायण स्त्रियां पोपा बाई के दरवाजे से ही स्वर्ग में प्रवेश करती हैं, वे धर्मराज की धर्म बहन बन गई तभी से कहते हैं “राज है पोपा बाई का, लेखा लेगी राई राई का” व्यक्ति के छोटे से छोटे कर्मों का भी ध्यान पोपा बाई रखती हैं, जो भी इस कथा को सुनता है कहता है हुंकारा भरता है पोपा बाई उनके अपराध क्षमा कर उन्हें स्वर्ग में प्रवेश देती हैं, इन दोनों कथाओं का प्रारंभ संक्रांति बसंत पंचमी अथवा किसी भी शुभ दिन से किया जा सकता है यह कथा एक वर्ष तक सुनी जाती है यदि साल भर ना सुन सके तो छ महीने सवा महीने व सात दिन नहीं तो एक ही दिन तो अवश्य सुने और उजमन कर दें कथा प्रारंभ करने के लिए हाथ में गेहूं के दाने लेकर धर्मराज व popa bai को मन ही मन प्रणाम कर इस कथा को सुने।

फिर पहले दिन लिए हुए इन गेहूं के दानों को लाल कपड़े में बांधकर तिजोरी अथवा पूजा घर में संभाल कर रख दें जितने समय तक यह गेहूं के दाने कपड़े में बंधे हुए उचित स्थान पर रखे रहते हैं तब तक घर पर किसी भी प्रकार की विपदा नहीं आती घर में धन और धान्य की बढ़ोतरी होती रहती है इसीलिए कम से कम साल भर तक इस कथा को सुना जाता है गेहूं के दानों को घर में रखा जाता है

अब नित्य श्रद्धा भाव से हुंकारा बोलते हुए इस कथा को सुने और सुनाएं उजमन में किसी ब्राह्मण को वस्त्र कंबल छाता टॉर्च चप्पल लोहे की धर्मराज की प्रतिमा सोने का सूरज चांदी का चंद्रमा चांदी की नाव चांदी की सीढ़ी तांबे का लोटा भोजन कराकर अथवा भोजन के साथ भेंट में दें यदि यह सामान उपलब्ध ना हो सके तो प्रतीक रूप में पैसा भी दिया जा सकता है।

ब्राह्मण ना मिले तो किसी भी मंदिर में यह सामग्री धर्मराज भगवान के निमित्त करके दान दी जा सकती है popa bai की कथा का प्रारंभ हाथ में राई लेकर किया जाता है उजमन में चार सूखे नारियल जिन्हें खोपरा या गोला भी कहा जाता है उनको दो टुकड़ों में तोड़े इस प्रकार आठ हिस्से बना लें इन आठ सुहागन को अन्यथा किसी मंदिर में दे दें, बोलिए धर्मराज की जय popa bai की जय इस प्रकार इस कथा को कहकर गुणवती सूर्य उत्तरायण होते ही बैकुंठ को गई।

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नमस्ते मेरा नाम जगदीश कुमार है , मे hindisanatan.com मे चौघड़िया, मंत्र-स्तोत्र, भजन, पाठ और पूजा विधि जैसे आध्यात्मिक विषयों पर लेख लिखता हूँ। मेरा उद्देश्य सनातन धर्म की शुद्ध और प्रमाणिक जानकारी लोगों तक पहुँचाना है।

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Jagdish Kumar

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