Sawan Somvar Vrat Katha- सावन सोमवार व्रत हिंदू धर्म में सबसे अधिक श्रद्धा से रखे जाने वाले व्रतों में से एक है। मान्यता है कि इस व्रत के साथ यदि इसकी कथा न सुनी या पढ़ी जाए, तो व्रत का पूरा फल नहीं मिलता। इसलिए हर सोमवार पूजा के बाद यह कथा जरूर सुननी चाहिए। नीचे यह पौराणिक कथा सरल भाषा में दी गई है।
सावन सोमवार व्रत कथा (Sawan Somvar Vrat Katha)
प्राचीन समय की बात है, अमरपुर नाम के एक नगर में एक बहुत धनी साहूकार रहता था। उसके पास धन-दौलत, यश और सम्मान की कोई कमी नहीं थी, लेकिन फिर भी वह मन ही मन सदा दुखी और अशांत रहता था। इसका कारण था — उसकी कोई संतान नहीं थी। घर में इतना वैभव होने के बावजूद, संतान सुख के बिना उसे सब कुछ अधूरा लगता था।
संतान प्राप्ति की कामना से वह साहूकार प्रत्येक सोमवार भगवान शिव का व्रत रखने लगा। हर सोमवार की शाम वह पास के शिव मंदिर जाकर विधिपूर्वक भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना करता। उसकी यह निष्ठा और नियमितता वर्षों तक बिना रुके चलती रही।
एक दिन कैलाश पर्वत पर भगवान शिव अपनी अर्धांगिनी माता पार्वती के साथ विराजमान थे। उन्होंने अपने भक्तों के कर्मों को देखते हुए उस साहूकार की भक्ति पर ध्यान दिया। माता पार्वती को साहूकार की यह निष्ठा देखकर बहुत प्रसन्नता हुई। उन्होंने भगवान शिव से आग्रह किया — “हे स्वामी, यह साहूकार आपका सच्चा भक्त है, वर्षों से बिना भूले हर सोमवार आपकी पूजा करता है। कृपया इसे संतान का वरदान दे दीजिए।”
भगवान शिव मुस्कुराए और बोले — “देवी, प्रत्येक प्राणी को उसके कर्मों के अनुसार ही फल प्राप्त होता है। इस साहूकार के भाग्य में संतान सुख लिखा ही नहीं है।” परंतु माता पार्वती का स्नेह और आग्रह देखकर अंततः भगवान शिव ने कहा — “ठीक है, तुम्हारे कहने पर मैं इसे पुत्र प्राप्ति का वरदान देता हूं, परंतु यह पुत्र केवल सोलह वर्ष की आयु तक ही जीवित रह पाएगा।”
कुछ समय बाद साहूकार के घर एक सुंदर पुत्र ने जन्म लिया। पूरे परिवार में खुशियां छा गईं, बड़े धूमधाम से उत्सव मनाया गया। समय बीतता गया और पुत्र बड़ा होने लगा। जब वह उपनयन संस्कार (यज्ञोपवीत) की आयु तक पहुंचा, साहूकार ने उसे शिक्षा के लिए अपने मामा के नगर काशी भेज दिया, यह सोचकर कि वहां विद्या अध्ययन के साथ-साथ भगवान विश्वनाथ की कृपा भी पुत्र पर बनी रहेगी।
रास्ते में एक नगर पड़ता था, जहां राजा अपनी पुत्री का विवाह करवा रहे थे, परंतु दुर्भाग्यवश जिस राजकुमार से विवाह होना तय हुआ था, वह एक आंख से काना था। यह बात राजा को स्वयं स्वीकार नहीं थी, इसलिए उन्होंने अपने मंत्री से षड़यंत्र रचवाया कि किसी अन्य सुंदर युवक को दूल्हा बनाकर थोड़ी देर के लिए फेरे करवा दिए जाएं, ताकि लोक-लाज बनी रहे।
संयोगवश साहूकार का यही पुत्र उस नगर से गुजर रहा था। मंत्री ने उसे यह कहकर रोक लिया और अस्थायी रूप से दूल्हा बनाकर राजकुमारी के फेरे करवा दिए। विवाह की रस्म पूरी होते ही युवक को वहां से आगे जाने दिया गया, और उसे इस बात का कोई अंदाजा भी नहीं था कि यह विवाह असल में हुआ या नहीं।
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आगे बढ़ते हुए काशी पहुंचकर वह पुत्र मामा के घर रहकर शिक्षा प्राप्त करने लगा। कुछ ही समय बाद, जब उसकी आयु सोलह वर्ष पूर्ण होने वाली थी, अचानक उसकी तबीयत बिगड़ गई और वह इस संसार को छोड़कर चल बसा — ठीक वैसे ही जैसा भगवान शिव ने पहले ही कह दिया था।
इधर साहूकार को जब यह समाचार मिला, तो वह शोक में डूब गया, परंतु उसकी पत्नी ने संयम रखते हुए विधि-विधान से हर सोमवार का व्रत और कथा-पाठ जारी रखा, यह विश्वास करते हुए कि भोलेनाथ अवश्य कोई मार्ग दिखाएंगे।
उधर, वही राजकुमारी जिससे गुप्त रूप से विवाह हुआ था, अपने पति की खोज करते हुए काशी पहुंची और वहीं धर्मशाला में रहकर प्रतिदिन शिव पूजा करने लगी। उसकी असीम भक्ति और पातिव्रत्य धर्म को देखकर माता पार्वती एक बार पुनः द्रवित हो उठीं और भगवान शिव से उस युवक को जीवनदान देने का आग्रह करने लगीं।
भगवान शिव ने अंततः माता पार्वती की प्रार्थना स्वीकार की और उस साहूकार-पुत्र को पुनर्जीवित कर दिया। युवक जीवित होकर उठ बैठा, मानो गहरी नींद से जागा हो। यह चमत्कार देखकर सब चकित रह गए। कुछ समय बाद वह राजकुमारी से मिला और दोनों साथ मिलकर अपने घर अमरपुर लौट आए।
जब साहूकार को पुत्र के जीवित लौट आने का समाचार मिला, तो उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। उसी रात भगवान शिव ने स्वयं साहूकार को स्वप्न में दर्शन देकर कहा — “हे साहूकार, तुम्हारे वर्षों के सोमवार व्रत और सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर मैंने तुम्हारे पुत्र को दीर्घायु प्रदान की है।”
इसी कथा के आधार पर यह मान्यता चली आ रही है कि जो भी व्यक्ति सच्चे मन से सावन सोमवार का व्रत रखता है और श्रद्धापूर्वक इस कथा को सुनता या पढ़ता है, भगवान शिव उसके सभी दुख दूर करके उसकी मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण करते हैं।
शिवजी की आरती
जय शिव ओंकारा ॐ जय शिव ओंकारा ।
ब्रह्मा विष्णु सदा शिव अर्धांगी धारा ॥
ॐ जय शिव ओंकारा ॥
एकानन चतुरानन पंचानन राजे ।
हंसानन गरुड़ासन वृषवाहन साजे ॥
ॐ जय शिव ओंकारा ॥
दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे।
त्रिगुण रूपनिरखता त्रिभुवन जन मोहे ॥
ॐ जय शिव ओंकारा ॥
अक्षमाला बनमाला रुण्डमाला धारी ।
चंदन मृगमद सोहै भाले शशिधारी ॥
ॐ जय शिव ओंकारा ॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे ।
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे ॥
ॐ जय शिव ओंकारा ॥
कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धर्ता ।
जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता ॥
ॐ जय शिव ओंकारा ॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका ।
प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका ॥
ॐ जय शिव ओंकारा ॥
काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रह्मचारी ।
नित उठि भोग लगावत महिमा अति भारी ॥
ॐ जय शिव ओंकारा ॥
त्रिगुण शिवजीकी आरती जो कोई नर गावे ।
कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे ॥
ॐ जय शिव ओंकारा ॥
जय शिव ओंकारा हर ॐ शिव ओंकारा ।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अद्धांगी धारा ॥
ॐ जय शिव ओंकारा ॥
व्रत और कथा पढ़ने का सही तरीका
पूजा-अर्चना संपन्न होने के बाद, दीपक जलाकर शिव-पार्वती के समक्ष बैठकर यह कथा पढ़ी या सुनी जानी चाहिए। कथा समाप्त होने पर भगवान शिव की आरती करें और परिवार के सदस्यों में प्रसाद वितरित करें। कथा को अधूरा छोड़ना या बीच में उठ जाना शुभ नहीं माना जाता।
कथा का सार और शिक्षा
यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति और निरंतरता का फल देर से ही सही, पर अवश्य मिलता है। साथ ही यह भी बताती है कि पातिव्रत्य धर्म और सच्ची श्रद्धा से बड़ी से बड़ी विपत्ति भी टल सकती है। यही कारण है कि आज भी लाखों श्रद्धालु सावन के हर सोमवार यह कथा पढ़ना अपने व्रत का अनिवार्य हिस्सा मानते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
प्रश्न: क्या सावन सोमवार व्रत कथा हर सोमवार पढ़नी चाहिए?
उत्तर: जी हां, माना जाता है कि बिना कथा सुने या पढ़े व्रत अधूरा रहता है, इसलिए हर सोमवार पूजा के बाद इसे जरूर पढ़ना चाहिए।
प्रश्न: यह कथा किस देवता से संबंधित है?
उत्तर: यह कथा मुख्य रूप से भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा तथा भक्ति की महिमा पर आधारित है।
प्रश्न: क्या इस व्रत को कोई भी रख सकता है?
उत्तर: हां, स्त्री-पुरुष, विवाहित-अविवाहित कोई भी श्रद्धा भाव से यह व्रत रख सकता है।
(Disclaimer: इस लेख में दी गई कथा और जानकारी पौराणिक मान्यताओं और परंपरागत धार्मिक स्रोतों पर आधारित है। हिन्दीसनातन इसकी ऐतिहासिक सत्यता का दावा नहीं करता। पाठक इसे आस्था और परंपरा के रूप में लें।)













