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महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् – अयि गिरिनन्दिनि (Mahishasura Mardini Stotram Lyrics)

hindisanatan
Published On: सितम्बर 26, 2026
महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् – अयि गिरिनन्दिनि (Mahishasura Mardini Stotram Lyrics)
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संस्कृत साहित्य में जितने भी देवी स्तोत्र रचे गए हैं, उनमें महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र (Mahishasura Mardini Stotram Lyrics) को उसकी काव्यात्मक सुंदरता और लयबद्धता के लिए विशेष स्थान प्राप्त है। यह स्तोत्र माँ दुर्गा के उस स्वरूप का वर्णन करता है जिन्होंने महिषासुर का वध करके सृष्टि की रक्षा की थी। आइए इस स्तोत्र को पूरा पढ़ते हैं और इसका महत्व समझते हैं।

महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र महत्व

यह स्तोत्र देवी के शौर्य, सौंदर्य और करुणा – तीनों भावों को एक साथ समेटे हुए है। हर श्लोक के अंत में आने वाली पंक्ति “जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते” इसे अत्यंत लयबद्ध और भक्ति में डुबो देने वाला बनाती है। नवरात्रि के दिनों में इस स्तोत्र का पाठ करने से देवी की विशेष कृपा प्राप्त होने की मान्यता है।

महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र (Mahishasura Mardini Stotram Lyrics)

अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनिनन्दिनुते
गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥1

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि श‌ङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते ।
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥2

अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते
शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमलय शृङ्गनिजालय मध्यगते ।
मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥3

अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्द गजाधिपते
रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते ।
निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥4

अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते
चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते ।
दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥5

अयि शरणागत वैरिवधूवर वीरवराभय दायकरे
त्रिभुवन मस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे ।
दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्गकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥6

अयि निजहुकृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते
समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते ।
शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥7

धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके
कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके ।
कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥8

सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते
कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते ।
धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥9

जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते
झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते ।
नटित नटार्थ नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥10

अयि सुमनःसुमनः सुमनः सुमनः सुमनोहरकान्तियुते
श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते ।
सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥11

सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते
विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते ।
शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥12

अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते
त्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते ।
अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥13

कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते
सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले ।
अलिकुलस‌कुङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥14

करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते
मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते ।
निजगणभूत महाशबरीगण सद्‌गुणसम्भृत केलितले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥15

कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे
प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे ।
जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥16

विजित सहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते
कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते ।
सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥17

पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे
अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।
तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥18

कनकलसत्कल सिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम्
भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् ।
तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम्
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥19

तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते
किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते ।
मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥20

अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे
अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते ।
यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥21

स्तुतिमिमां स्तिमितः सुसमाधिना नियमतो यमतोनुदिनं पठेत्।
परमया रमया स निषेव्यते परिजनोऽरिजनोऽपि च तं भजेत् ॥22

॥ हरिः ॐ तत्सत् महिषासुरमर्दिनिस्तोत्रं हरिः ॐ तत्सत् ॥

Mahishasura Mardini Stotram Lyrics in Hindi With Meaning pdf

आप इसका pdf डाउनलोड कर सकते है और उसका पूजा मे आप पाठ कर सकते है।

अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनिनन्दिनुते
गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥1

अर्थ: हिमालय की पुत्री, समस्त पृथ्वी को प्रसन्न रखने वाली, संसार का मनोरंजन करने वाली और नंदी जैसे गणों से नमस्कृत होने वाली देवी! जो विंध्याचल के शिखर पर विराजमान हैं, भगवान विष्णु की प्रिय हैं और इंद्र द्वारा पूजित हैं – शिवजी के विशाल परिवार की स्वामिनी और ऐश्वर्य की दाता, हे महिषासुर की संहारक शैलसुता, आपकी जय हो।

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि श‌ङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते ।
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 2

अर्थ: देवताओं को वरदान देने वाली, दुर्जय असुरों का दमन करने वाली, दुर्मुख नामक दैत्य पर क्रोधित होने वाली, फिर भी सदा हर्षित रहने वाली! तीनों लोकों का पालन करने वाली, शिव को प्रसन्न रखने वाली, पापों का शमन करने वाली और गर्जना में रमण करने वाली! दानवों और दैत्यों पर कोप करने वाली, उनके अभिमान को शांत कर देने वाली और सागर-पुत्री के रूप में प्रतिष्ठित देवी, आपकी जय हो।

अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते
शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमलय शृङ्गनिजालय मध्यगते ।
मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥3

अर्थ: हे जगत की माता! कदंब वृक्षों के वन में रहना जिन्हें प्रिय है, जो सदा मुस्कुराती रहती हैं और ऊंचे हिमालय पर्वत के शिखर पर अपना निवास बनाए हुए हैं। मधु से भी अधिक मधुर स्वभाव वाली, मधु और कैटभ नामक असुरों का नाश करने वाली और रासलीला में रमण करने वाली देवी, आपकी जय हो।

अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्द गजाधिपते
रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते ।
निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥4

अर्थ: गजराज दैत्य के धड़ के सैकड़ों टुकड़े कर देने वाली, शत्रु-सेना के हाथियों के गंडस्थल को अपने प्रचंड पराक्रम से चीर डालने वाली सिंह-सवार देवी! अपनी भुजाओं के प्रहार से सेनापतियों के मस्तक धराशायी कर देने वाली, आपकी जय हो।

अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते
चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते ।
दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥5

अर्थ: युद्धभूमि में मदमस्त शत्रुओं के संहार से जिनकी अपराजेय शक्ति और भी बढ़ जाती है, जो गूढ़ विचारों वाले प्रमथगणों के अधिपति भगवान शिव को भी अपना दूत बनाती हैं! जो दुष्ट बुद्धि वाले दानव-दूतों के लिए अगम्य और अंत करने वाली हैं, हे देवी आपकी जय हो।

अयि शरणागत वैरिवधूवर वीरवराभय दायकरे
त्रिभुवन मस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे ।
दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्गकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥6

अर्थ: शरण में आई शत्रुओं की स्त्रियों के वीर पतियों को भी अभय देने वाला हाथ रखने वाली, तीनों लोकों को पीड़ित करने वाले दैत्यों के मस्तक पर पवित्र त्रिशूल चलाने वाली, और देवताओं के दुंदुभि-नाद से समस्त दिशाओं को गुंजायमान करने वाली देवी, आपकी जय हो।

अयि निजहुकृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते
समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते ।
शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥7

अर्थ: केवल अपनी हुंकार मात्र से धूम्रलोचन जैसे सैकड़ों असुरों को भस्म करने वाली, युद्ध में रक्तबीज के रक्त से जन्मे नए-नए असुरों का भी संहार कर देने वाली, और शुंभ-निशुंभ के महायुद्ध से तृप्त हुए भूत-पिशाचों की प्रिय देवी, आपकी जय हो।

धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके
कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके ।
कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥8

अर्थ: युद्ध के क्षणों में धनुष धारण करके अपने अंगों को हिलाते ही शत्रु-दल को कंपा देने वाली, स्वर्ण-सी चमकीली बाणों की झड़ी से योद्धाओं का वध करने वाली, और चतुरंगिणी सेना को रणभूमि में रौंद देने वाली देवी, आपकी जय हो।

सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते
कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते ।
धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥9

अर्थ: देवांगनाओं द्वारा “तत-थेयि-थेयि” की लय पर किए गए भावपूर्ण नृत्य में रमण करने वाली, विविध तालों से सजे कुतूहलपूर्ण गीतों को सुनने में लीन रहने वाली, और मृदंग की गंभीर ध्वनि में मग्न रहने वाली देवी, आपकी जय हो।

जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते
झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते ।
नटित नटार्थ नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥10

अर्थ: जप और जयकार से युक्त स्तुति में तत्पर संपूर्ण विश्व द्वारा नमस्कृत देवी! अपने नूपुरों की झंकार से भूतगणों के स्वामी शिव को भी मोहित कर लेने वाली, और नटराज के नृत्य से सजे नाट्य में सुंदर गायन करने वाली देवी, आपकी जय हो।

अयि सुमनःसुमनः सुमनः सुमनः सुमनोहरकान्तियुते
श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते ।
सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥11

अर्थ: देवताओं द्वारा अर्पित पुष्पों से अत्यंत मनोहर कांति धारण करने वाली, चंद्रमा के समान शीतल मुख वाली, और अपने सुंदर नेत्रों की चंचलता से भ्रमरों को भी मोहित कर देने वाली देवी, आपकी जय हो।

सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते
विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते ।
शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥12

अर्थ: महायुद्ध के श्रेष्ठ वीरों द्वारा किए गए भाला-युद्ध को निहारने में रुचि रखने वाली, वन में बसी भीलनियों के समूह से घिरी रहने वाली, और कान पर सजाए लाल, कोमल एवं खिले हुए पत्तों से सुशोभित देवी, आपकी जय हो।

अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते
त्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते ।
अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥13

अर्थ: मदोन्मत्त गजराज की सी मंथर और मनमोहक गति वाली, तीनों लोकों के आभूषण-स्वरूप, समुद्र-पुत्री के रूप में प्रतिष्ठित, और सुंदरियों के मन को मोहित करने वाले कामदेव को भी जीवनदान देने वाली देवी, आपकी जय हो।

कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते
सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले ।
अलिकुलस‌कुङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥14

अर्थ: कमलदल के समान कोमल और निर्मल कांति वाले ललाट पर चंद्रमा से सुशोभित, संपूर्ण कलाओं और विलासों की आश्रयदाता, राजहंसों की क्रीड़ा से घिरी हुई, और घने काले केशपाश में मौलश्री पुष्पों की सुगंध से भ्रमरों को आकर्षित करने वाली देवी, आपकी जय हो।

करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते
मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते ।
निजगणभूत महाशबरीगण सद्‌गुणसम्भृत केलितले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥15

अर्थ: अपने हाथ की मुरली की मधुर ध्वनि से कोयल को भी लजा देने वाली, भ्रमरों की गुंजार से गूंजते पर्वतीय कुंजों में विहार करने वाली, और अपने भूत-गणों तथा शबरी-जनों की क्रीड़ाओं को देखने में सदा तल्लीन रहने वाली देवी, आपकी जय हो।

कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे
प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे ।
जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥16

अर्थ: कमर पर सजे पीले रेशमी वस्त्र की चमक से चंद्रमा की प्रभा को भी फीका करने वाली, प्रणाम करते देवताओं और असुरों के मुकुट-मणियों की किरणों से जिनके चरण-नख चमकते हैं, और स्वर्ण-पर्वत मेरु को भी लजा देने वाले उन्नत वक्षस्थल वाली देवी, आपकी जय हो।

विजित सहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते
कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते ।
सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥17

अर्थ: सहस्र किरणों वाले सूर्यदेव से पूजित, तारकासुर का संहार करने वाले अपने पुत्र कार्तिकेय से प्रणाम पाने वाली, और राजा सुरथ तथा वैश्य समाधि की गहन तपस्या में सदा प्रिय रहने वाली देवी, आपकी जय हो।

पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे
अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।
तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥18

अर्थ: हे करुणा की निधि, कल्याणकारी देवी! जो प्रतिदिन आपके चरण-कमल की उपासना करता है, वह लक्ष्मी का आश्रय क्यों न पाए। आपके चरण ही परम पद हैं, तो निरंतर इनका ध्यान करने वाले भक्त को क्या कुछ प्राप्त नहीं होगा।

कनकलसत्कल सिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम्
भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् ।
तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम्
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥19

अर्थ: जो स्वर्ण-कलश के जल से आपकी गुण-भूमि (मंदिर आंगन) को पवित्र करता है, वह इंद्राणी के समान सुख से वंचित क्यों रहे। हे देवताओं से नमित देवी! मैं आपके चरणों की ही शरण लूं, जहां कल्याण का सदा निवास है।

तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते
किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते ।
मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥20

अर्थ: आपका निर्मल, चंद्रमा-सा मुखमंडल जिसे प्रसन्न कर लेता है, क्या उसे इंद्रलोक की चंद्रमुखी अप्सराएं भी सुख से वंचित रख सकती हैं। हे शिव-नाम-धन देवी! मेरा तो यही मत है कि आपकी कृपा से कुछ भी असंभव नहीं।

अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे
अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते ।
यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥21

अर्थ: हे उमा! आप सदा दीनों पर दया रखने वाली हैं, इसलिए मुझ पर भी कृपा करें। हे जगत-जननी! जैसी आपकी करुणामयी प्रकृति है, वैसी ही कृपा मुझ पर बनाए रखें और मेरे संताप को दूर करें।

स्तुतिमिमां स्तिमितः सुसमाधिना नियमतो यमतोनुदिनं पठेत्।
परमया रमया स निषेव्यते परिजनोऽरिजनोऽपि च तं भजेत् ॥22

अर्थ: जो शांत और एकाग्र मन से, इंद्रियों को वश में रखते हुए, नियमपूर्वक प्रतिदिन इस स्तुति का पाठ करता है, महालक्ष्मी सदा उसके घर में निवास करती हैं, और उसके परिजन ही नहीं बल्कि शत्रु भी उसकी सेवा में तत्पर हो जाते हैं।

॥ हरिः ॐ तत्सत् महिषासुरमर्दिनिस्तोत्रं हरिः ॐ तत्सत् ॥

स्तोत्र का वर्णन

इस स्तोत्र के हर श्लोक में देवी के किसी न किसी स्वरूप, उनके अस्त्र-शस्त्र, उनके पराक्रम और उनके सौंदर्य का वर्णन है। कहीं देवी को पर्वतराज हिमालय की पुत्री बताया गया है, तो कहीं उन्हें महिषासुर, शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज जैसे असुरों का संहार करने वाली शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है। अंतिम श्लोकों में भक्त देवी से करुणा और शरण मांगता है, यह विश्वास व्यक्त करते हुए कि जो भी नियमपूर्वक इस स्तोत्र का पाठ करेगा, उसे देवी की विशेष कृपा प्राप्त होगी।

पाठ विधि

प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ आसन पर बैठें। देवी के सामने दीपक जलाकर शांत और एकाग्र मन से इस स्तोत्र का पाठ करें। संस्कृत उच्चारण में यदि कठिनाई हो, तो धीरे-धीरे और स्पष्ट रूप से पढ़ने का प्रयास करें, क्योंकि इसकी लय ही इसे विशेष बनाती है।

पाठ के लाभ

  • मन में साहस और आत्मबल का संचार होता है
  • नकारात्मक शक्तियों और भय से मुक्ति मिलती है
  • देवी की विशेष कृपा और सुरक्षा प्राप्त होती है
  • नवरात्रि में इसका पाठ करने से संपूर्ण फल की प्राप्ति मानी जाती है

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र किसने लिखा है?

इसे परंपरागत रूप से आदि शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाता है, हालांकि इस पर विद्वानों के बीच अलग-अलग मत हैं।

यह स्तोत्र कब पढ़ना चाहिए?

इसे नवरात्रि के दिनों में विशेष रूप से पढ़ा जाता है, हालांकि किसी भी दिन प्रातःकाल इसका पाठ किया जा सकता है।

क्या यह स्तोत्र कठिन है पढ़ने में?

संस्कृत में होने के कारण शुरुआत में यह कठिन लग सकता है, लेकिन नियमित अभ्यास से इसकी लय और उच्चारण सहज हो जाते हैं।

निष्कर्ष

महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र माँ दुर्गा की शक्ति और सौंदर्य का अद्भुत काव्यात्मक चित्रण है। श्रद्धा और नियम के साथ इसका पाठ करने से भक्त को देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। आपको ये देवी स्तोत्र कैसा लगा हमे कमेन्ट में जरूर बताए और इस स्तोत्र को अपने परिवार और दोस्तों को भी भेजे ताकि वो भी इसका पाठ करे और देवी की विशेष कृपा प्राप्त कर सके।

(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी पारंपरिक मान्यताओं, धार्मिक ग्रंथों और पंचांग गणनाओं पर आधारित है। हिन्दीसनातन इसकी पूर्ण सटीकता का दावा नहीं करता। किसी भी बड़े अनुष्ठान से पहले योग्य पंडित/पुरोहित से परामर्श अवश्य लें।)

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मैं HindiSanatan.com का संस्थापक हूं। सनातन धर्म, भक्ति और आध्यात्मिकता से जुड़े लेख, आरती-चालीसा एवं व्रत कथाएं श्रद्धापूर्वक स्वयं शोध करके लिखता हूं, ताकि सही और प्रामाणिक जानकारी सभी भक्तों तक पहुंच सके। जय श्री राधे कृष्ण 🙏

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Jagdish Kumar

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