शारदीय नवरात्र 2026 (Shardiya Navratri 2026) का सातवां दिन शनिवार, 17 अक्टूबर है, जो मां दुर्गा के सातवें स्वरूप मां कालरात्रि को समर्पित है। मां कालरात्रि को देवी दुर्गा का सबसे उग्र रूप माना जाता है, लेकिन अपने भक्तों के लिए वे सदैव शुभ फल देने वाली हैं, इसीलिए इन्हें ‘शुभंकरी’ भी कहा जाता है। भक्त मां कालरात्रि की पूजा से भय, नकारात्मक ऊर्जा और बाधाओं से मुक्ति की कामना करते हैं।
नवरात्र के सातवें दिन भक्त मां कालरात्रि की पूजा करते हैं, उनके मंत्रों का जाप करते हैं और उन्हें गुड़ का भोग अर्पित करते हैं। इस दिन ग्रे (स्लेटी) रंग का विशेष महत्व माना जाता है। आइए जानते हैं 17 अक्टूबर, 2026 को होने वाली मां कालरात्रि की पूजा का शुभ मुहूर्त, विधि, मंत्र, भोग, रंग, कथा और धार्मिक महत्व।
शारदीय नवरात्र 2026 सातवां दिन तिथि, देवी और रंग
दिनांक: शनिवार, 17 अक्टूबर 2026
नवरात्र दिवस: सातवां दिन (आश्विन शुक्ल सप्तमी)
देवी की आराधना: मां कालरात्रि
सातवें नवरात्र का रंग: ग्रे (स्लेटी)
परंपरागत भोग: गुड़
मां कालरात्रि कौन हैं?
मां कालरात्रि नवदुर्गा का सातवां स्वरूप हैं। ‘काल’ का अर्थ है मृत्यु या समय, और ‘रात्रि’ का अर्थ है अंधकार यानी वह शक्ति जो अज्ञान और भय के अंधकार का अंत करती है। उनका स्वरूप देखने में भयानक है, पर उनका स्वभाव अपने भक्तों के प्रति अत्यंत कल्याणकारी है, माना जाता है कि देवी के इस रूप मे सभी राक्षस, भूत, प्रेत, पिसाच, और नकारात्मक ऊर्जाओं का नाश होता है।
इनके गले मे विद्धुत कि तरह चमकने वाली माला है, इनकी आखों मे अग्नि कि वर्षा होती है, एक हाथ मे शत्रुयों कि गर्दन पकड़कर और दूसरे हाथ मे खड़क तलवार से युद्ध स्थल मे उनका नाश करने वाली कालरात्रि अपने विकट रूप मे नजर आती है।
माँ कालरात्रि कि सवारी गर्दभ यानि गधा है। जो समस्त जीवजन्तुओं में सबसे ज्यादा परिश्रमी और निर्भय होकर अपनी अधिष्ठात्री देवी कालरात्रि को लेकर इस संसार में विचरण करा रहा है। माना जाता है कि देवी के इस रूप में सभी राक्षस, भूत, प्रेत, पिसाच और नकारात्मक ऊर्जाओं का नाश होता है।
माना जाता है कि उनकी उपासना से अकाल मृत्यु का भय, नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव और शनि संबंधी कष्ट शांत होते हैं। साधना परंपरा में मां कालरात्रि का संबंध सहस्रार चक्र से जोड़ा जाता है।
मां कालरात्रि की पूजा सरल तरीके से, श्रद्धा और शुद्धता के साथ की जा सकती है।
- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और पूजा स्थल को गंगाजल से पवित्र करें।
- घटस्थापना में स्थापित कलश की अपने घर की परंपरा के अनुसार पूजा करें।
- मां की तस्वीर या मूर्ति के सामने दीपक और अगरबत्ती जलाएं (सुरक्षा का ध्यान रखते हुए)।
- फूल, अक्षत, रोली और चंदन अर्पित करें। मां को रात की रानी या लाल गुड़हल का फूल चढ़ाना शुभ माना जाता है।
- भोग में गुड़ अर्पित करें।
- कपूर से आरती करें और मंत्रों का जाप करें।
- इस दिन दुर्गा सप्तशती या काली चालीसा का पाठ भी लाभकारी माना जाता है।
नवरात्र सातवें दिन मां कालरात्रि से जुड़े मंत्र
माँ कालरात्रि नाम मंत्र
ॐ देवी कालरात्र्यै नमः॥
माँ कालरात्रि ध्यान मंत्र
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्यद् देवी दानवघातिनी॥
माँ कालरात्रि स्तुति मंत्र
या देवी सर्वभूतेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
अर्थ: हे माँ! सर्वत्र विराजमान और कालरात्रि के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है।
माँ कालरात्रि माता की आरती
कालरात्रि जय जय महाकाली।
काल के मुंह से बचाने वाली ॥
दुष्ट संघारक नाम तुम्हारा।
महाचंडी तेरा अवतारा ॥
पृथ्वी और आकाश पे सारा।
महाकाली है तेरा पसारा ॥
खड्ग खप्पर रखने वाली।
दुष्टों का लहू चखने वाली ॥
कलकत्ता स्थान तुम्हारा।
सब जगह देखूं तेरा नजारा ॥
सभी देवता सब नर-नारी।
गावें स्तुति सभी तुम्हारी ॥
रक्तदन्ता और अन्नपूर्णा।
कृपा करे तो कोई भी दुःख ना ॥
ना कोई चिंता रहे ना बीमारी।
ना कोई गम ना संकट भारी ॥
उस पर कभी कष्ट ना आवे।
महाकाली माँ जिसे बचावे ॥
तू भी भक्त प्रेम से कह।
कालरात्रि माँ तेरी जय ॥
माँ कालरात्रि को भोग में क्या चढ़ाएं?
नवरात्र के सातवें दिन मां कालरात्रि को गुड़ का भोग लगाना चाहिए। मान्यता है कि इससे दुख और दरिद्रता दूर होती है। गुड़ से बनी मिठाइयां या गुड़ के साथ फल भी प्रसाद के रूप में चढ़ाए जा सकते हैं। पूजा के बाद इस प्रसाद को परिवार में बांटें, और चाहें तो कुछ हिस्सा ज़रूरतमंद को भी दें।
नवरात्र के सातवें दिन ग्रे रंग का महत्व
इस साल नवरात्र का सातवां दिन 17 अक्टूबर 2026, शनिवार को पड़ रहा है। नवरात्र की रंग परंपरा में दिन के वार के अनुसार रंग तय होता है, और शनिवार का रंग ग्रे माना जाता है। ग्रे रंग को संतुलन, गंभीरता और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है, जो मां कालरात्रि के उस स्वरूप से मेल खाता है जो भय के बीच भी अडिग रहने की सीख देता है। इस दिन पूजा के समय ग्रे रंग के वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है।
माँ कालरात्रि की पौराणिक कथा
देवी महात्म्य की कथा के अनुसार, जब शुंभ-निशुंभ के सेनापति चंड और मुंड ने देवताओं को त्रस्त कर रखा था, तब देवी पार्वती के क्रोध से एक उग्र स्वरूप प्रकट हुआ। इसी स्वरूप ने चंड और मुंड का वध किया, और इसी कारण देवी चामुंडा के नाम से भी जानी गईं।
इसके बाद रक्तबीज नामक असुर का प्रसंग आता है, जिसके रक्त की हर बूंद धरती पर गिरते ही एक नया असुर बन जाती थी। जब सामान्य युद्ध से उसका अंत संभव नहीं हुआ, तब मां कालरात्रि ने उसका रक्त भूमि पर गिरने से पहले ही पी लिया, जिससे नए असुर पैदा होने बंद हो गए और रक्तबीज का अंत हुआ।
यह कथा बताती है कि जब अंधकार सबसे गहरा लगे, तब भी शक्ति और साहस के साथ उसका सामना किया जा सकता है। नवरात्र में मां कालरात्रि की कथा इसी आस्था और निर्भयता को प्रेरित करने के लिए सुनी और पढ़ी जाती है।
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(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी विभिन्न ज्योतिषीय गणनाओं, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं के आधार पर प्रस्तुत की गई है। हिन्दीसनातन इस जानकारी की सत्यता या सटीकता का दावा नहीं करता है। पाठकों से अनुरोध है कि इसे केवल जानकारी के रूप में लें और किसी भी धार्मिक या आध्यात्मिक निर्णय से पहले विशेषज्ञ की सलाह लें। हमारा उद्देश्य किसी भी प्रकार के अंधविश्वास या गलत धारणाओं को बढ़ावा देना नहीं है।)
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