यदि आप विष्णु सहस्रनाम (Vishnu sahasranamam lyrics in hindi) में खोज रहे हैं, तो यह लेख आपके लिए है। यहाँ आपको विष्णु सहस्रनाम का पूरा पाठ देवनागरी में, हर श्लोक के सरल हिंदी अर्थ के साथ मिलेगा। साथ ही आप जानेंगे कि यह स्तोत्र कैसे शुरू हुआ, इसका पाठ कब और कैसे करना चाहिए और शास्त्र इसके फल के बारे में क्या कहते हैं।
श्री विष्णु सहस्रनाम क्या है?
“सहस्र” का अर्थ है हज़ार और “नाम” का अर्थ है नाम। इस तरह विष्णु सहस्रनाम का सीधा अर्थ है भगवान विष्णु के एक हज़ार नाम। ये केवल उपाधियाँ नहीं हैं। हर नाम ईश्वर के किसी गुण, स्वरूप या लीला की ओर संकेत करता है। कोई नाम उनकी सर्वव्यापकता बताता है, कोई करुणा, कोई शक्ति और कोई उनका अवतार।
इंटरनेट के कई पेजों पर लिखा मिलता है कि इसमें “चार हज़ार नाम” हैं। यह गलत है। सहस्रनाम में 1000 नाम ही हैं।
विष्णु सहस्रनाम कि कथा
विष्णु सहस्रनाम महाभारत के अनुशासन पर्व में आता है, जिसके अध्याय 149 में यह स्तोत्र मिलता है। इसे महर्षि वेदव्यास की रचना माना जाता है।
इसकी पृष्ठभूमि बहुत मार्मिक है। कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त हो चुका था। पितामह भीष्म शर-शय्या पर थे और उत्तरायण की प्रतीक्षा कर रहे थे। उसी समय युधिष्ठिर ने उनसे दो गहरे प्रश्न पूछे। पहला प्रश्न था कि इस संसार में ऐसा कौन-सा एक देवता है जो सबका सहारा है। दूसरा प्रश्न था कि किसकी स्तुति और पूजा से मनुष्य का कल्याण होता है और क्या जपने से जीव जन्म-मृत्यु के बंधन से छूट जाता है।
इन प्रश्नों के उत्तर में भीष्म पितामह ने भगवान विष्णु के हज़ार नामों का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि भक्ति के साथ पुरुषोत्तम की स्तुति और अर्चना करना उनके मत में सबसे बड़ा धर्म है।
स्तोत्र की संरचना
विष्णु सहस्रनाम के पाठ में कई हिस्से आते हैं। सबसे पहले प्रारंभिक और ध्यान श्लोक पढ़े जाते हैं, जिनसे मन एकाग्र होता है। उसके बाद भीष्म और युधिष्ठिर का संवाद आता है, जो स्तोत्र की भूमिका है। फिर विनियोग आता है, जिसमें बताया गया है कि इस स्तोत्र के ऋषि वेदव्यास हैं, छंद अनुष्टुप् है और देवता भगवान विष्णु हैं।
इसके बाद मूल स्तोत्र आता है, जिसमें लगभग 107 से 108 श्लोकों में 1000 नाम हैं। श्लोकों की गिनती अलग-अलग मुद्रित संस्करणों में थोड़ी भिन्न हो सकती है। मूल स्तोत्र के बाद फलश्रुति आती है, जिसमें पाठ के फल का वर्णन है, और अंत में क्षमा-प्रार्थना और समर्पण के श्लोक पढ़े जाते हैं।
विष्णु सहस्रनाम का महत्व
शास्त्र इस स्तोत्र को सर्वोच्च साधनाओं में गिनता है। भीष्म पितामह ने इसे अपने मत में सभी धर्मों में श्रेष्ठ धर्म बताया है। यह स्तोत्र भक्ति और ज्ञान दोनों का संगम है, क्योंकि हर नाम का अर्थ समझकर पढ़ने से पाठ केवल उच्चारण न रहकर चिंतन बन जाता है।
इसके साथ एक सुंदर परंपरा भी जुड़ी है कि पूरा पाठ न हो सके तो भी फल से वंचित नहीं रहना पड़ता। एक कथा में अर्जुन के पूछने पर श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो मुझे हज़ार नामों से स्तुति करना चाहे, वह एक श्लोक से भी स्तुति कर सकता है। एक अन्य कथा में पार्वतीजी के पूछने पर शिवजी “राम” नाम को सहस्रनाम के बराबर बताते हैं।
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विष्णु सहस्रनाम पाठ की विधि
पाठ से पहले स्नान करके साफ वस्त्र पहनें और किसी शांत स्थान पर बैठें। सुबह का समय, खासकर ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय के आसपास, पारंपरिक रूप से श्रेष्ठ माना जाता है, पर भक्ति के साथ किसी भी शांत समय पर इसे पढ़ा जा सकता है।
कुश या ऊनी आसन पर बैठकर भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र के सामने घी का दीपक जलाएँ। फिर मन में संकल्प लें कि आप किस भावना से पाठ कर रहे हैं। इसके बाद ध्यान श्लोक पढ़ें और फिर मूल पाठ शुद्ध उच्चारण के साथ धीरे-धीरे पढ़ें। संस्कृत न आती हो तो नीचे दिया देवनागरी पाठ देखकर पढ़ें और किसी जानकार से उच्चारण सुन लें।
परंपरा में गुरुवार, एकादशी, पूर्णिमा, जन्माष्टमी और विष्णु से जुड़े पर्व विशेष माने जाते हैं, हालाँकि नियमित रोज़ाना पाठ भी उत्तम बताया गया है। आम गति से पूरे पाठ में लगभग 20 से 30 मिनट लगते हैं।
Vishnu sahasranamam lyrics in hindi (संपूर्ण पाठ)
नीचे स्तोत्र का पाठ क्रम से दिया गया है। पहले प्रारंभिक और ध्यान श्लोक हैं, फिर भीष्म-युधिष्ठिर संवाद के मुख्य श्लोक, और उसके बाद मूल स्तोत्र श्लोक 1 से 108 तक। हर श्लोक के नीचे सरल हिंदी अर्थ है। कुछ नामों की एक से अधिक व्याख्याएँ परंपरा में मिलती हैं, इसलिए अर्थ आचार्यों के मतभेद के अनुसार थोड़े भिन्न हो सकते हैं।
प्रारंभिक श्लोक
ॐ श्रीपरमात्मने नमः ।
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
ॐ अथ सकलसौभाग्यदायकं श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम् ।
हरिः ॐ ॥
शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥ १ ॥
यस्य द्विरदवक्त्राद्याः पारिषद्याः परः शतम् ।
विघ्नं निघ्नन्ति सततं विष्वक्सेनं तमाश्रये ॥ २ ॥
व्यासं वसिष्ठनप्तारं शक्तेः पौत्रमकल्मषम् ।
पराशरात्मजं वन्दे शुकतातं तपोनिधिम् ॥ ३ ॥
व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे ।
नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्ठाय नमो नमः ॥ ४ ॥
अविकाराय शुद्धाय नित्याय परमात्मने ।
सदैकरूपरूपाय विष्णवे सर्वजिष्णवे ॥ ५ ॥
यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात् ।
विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे ॥ ६ ॥
नमः समस्तभूतानामादिभूताय भूभृते ।
अनेकरूपरूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे ॥
ॐ नमो विष्णवे प्रभविष्णवे ॥
भीष्म और युधिष्ठिर का संवाद
श्रीवैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा धर्मानशेषेण पावनानि च सर्वशः ।
युधिष्ठिरः शान्तनवं पुनरेवाभ्यभाषत ॥ ७ ॥
युधिष्ठिर उवाच
किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम् ।
स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम् ॥ ८ ॥
को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः ।
किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात् ॥ ९ ॥
भीष्म उवाच
जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम् ।
स्तुवन् नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः ॥ १० ॥
तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम् ।
ध्यायन् स्तुवन् नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च ॥ ११ ॥
अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम् ।
लोकाध्यक्षं स्तुवन्नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत् ॥ १२ ॥
ब्रह्मण्यं सर्वधर्मज्ञं लोकानां कीर्तिवर्धनम् ।
लोकनाथं महद्भूतं सर्वभूतभवोद्भवम् ॥ १३ ॥
एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः ।
यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा ॥ १४ ॥
परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः ।
परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् ॥ १५ ॥
पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् ।
दैवतं देवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ॥ १६ ॥
यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे ।
यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥ १७ ॥
तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते ।
विष्णोर्नामसहस्रं मे शृणु पापभयापहम् ॥ १८ ॥
यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः ।
ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये ॥ १९ ॥
ऋषिर्नाम्नां सहस्रस्य वेदव्यासो महामुनिः ।
छन्दोऽनुष्टुप् तथा देवो भगवान् देवकीसुतः ॥ २० ॥
अमृतांशूद्भवो बीजं शक्तिर्देवकीनन्दनः ।
त्रिसामा हृदयं तस्य शान्त्यर्थे विनियुज्यते ॥ २१ ॥
विष्णुं जिष्णुं महाविष्णुं प्रभविष्णुं महेश्वरम् ।
अनेकरूपदैत्यान्तं नमामि पुरुषोत्तमम् ॥ २२ ॥
ध्यान श्लोक
क्षीरोदन्वत्प्रदेशे शुचिमणिविलसत्सैकते मौक्तिकानां
मालाकॢप्तासनस्थः स्फटिकमणिनिभैर्मौक्तिकैर्मण्डिताङ्गः ।
शुभ्रैरभ्रैरदभ्रैरुपरिविरचितैर्मुक्तपीयूषवर्षै-
रानन्दी नः पुनीयादरिनलिनगदाशङ्खपाणिर्मुकुन्दः ॥ १ ॥
भूः पादौ यस्य नाभिर्वियदसुरनिलश्चन्द्रसूर्यौ च नेत्रे
कर्णावाशाः शिरो द्यौर्मुखमपि दहनो यस्य वास्तेयमब्धिः ।
अन्तःस्थं यस्य विश्वं सुरनरखगगोभोगिगन्धर्वदैत्यैः
चित्रं रंरम्यते तं त्रिभुवनवपुषं विष्णुमीशं नमामि ॥ २ ॥
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
ॐ शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥ ३ ॥
मेघश्यामं पीतकौशेयवासं
श्रीवत्साङ्कं कौस्तुभोद्भासिताङ्गम् ।
पुण्योपेतं पुण्डरीकायताक्षं
विष्णुं वन्दे सर्वलोकैकनाथम् ॥ ४ ॥
नमः समस्तभूतानामादिभूताय भूभृते ।
अनेकरूपरूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे ॥ ५ ॥
सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं
सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम् ।
सहारवक्षःस्थलकौस्तुभश्रियं
नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम् ॥ ६ ॥
छायायां पारिजातस्य हेमसिंहासनोपरि
आसीनमम्बुदश्याममायताक्षमलंकृतम् ।
चन्द्राननं चतुर्बाहुं श्रीवत्साङ्कितवक्षसं
रुक्मिणीसत्यभामाभ्यां सहितं कृष्णमाश्रये ॥ ७ ॥
Vishnu sahasranamam lyrics in hindi (मूल स्तोत्र)
हरिः ॐ ।
ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः ।
भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥ १ ॥
पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः ।
अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥ २ ॥
योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः ।
नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः ॥ ३ ॥
सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः ।
सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥ ४ ॥
स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः ।
अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ॥ ५ ॥
अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः ।
विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ॥ ६ ॥
अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः ।
प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम् ॥ ७ ॥
ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः ।
हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥ ८ ॥
ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः ।
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान् ॥ ९ ॥
सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः ।
अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ॥ १० ॥
अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः ।
वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिःसृतः ॥ ११ ॥
वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्माऽसम्मितः समः ।
अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ॥ १२ ॥
रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः ।
अमृतः शाश्वतस्थाणुर्वरारोहो महातपाः ॥ १३ ॥
सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः ।
वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित् कविः ॥ १४ ॥
लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः ।
चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ॥ १५ ॥
भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः ।
अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ॥ १६ ॥
उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरूर्जितः ।
अतीन्द्रः सङ्ग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ॥ १७ ॥
वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः ।
अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः ॥ १८ ॥
महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः ।
अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक् ॥ १९ ॥
महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः ।
अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः ॥ २० ॥
मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः ।
हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ॥ २१ ॥
अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः सन्धाता सन्धिमान् स्थिरः ।
अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ॥ २२ ॥
गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः ।
निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ॥ २३ ॥
अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान् न्यायो नेता समीरणः ।
सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ २४ ॥
आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः ।
अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः ॥ २५ ॥
सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः ।
सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः ॥ २६ ॥
असङ्ख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः ।
सिद्धार्थः सिद्धसङ्कल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः ॥ २७ ॥
वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः ।
वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ॥ २८ ॥
सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः ।
नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ॥ २९ ॥
ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः ।
ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः ॥ ३० ॥
अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः ।
औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः ॥ ३१ ॥
भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽनलः ।
कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः ॥ ३२ ॥
युगादिकृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः ।
अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित् ॥ ३३ ॥
इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः ।
क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः ॥ ३४ ॥
अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः ।
अपांनिधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ॥ ३५ ॥
स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः ।
वासुदेवो बृहद्भानुरादिदेवः पुरन्दरः ॥ ३६ ॥
अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः ।
अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ॥ ३७ ॥
पद्मनाभोऽरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत् ।
महर्द्धिरृद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः ॥ ३८ ॥
अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः ।
सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान् समितिञ्जयः ॥ ३९ ॥
विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः ।
महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः ॥ ४० ॥
उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः ।
करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः ॥ ४१ ॥
व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः ।
परर्द्धिः परमस्पष्टस्तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ॥ ४२ ॥
रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नयोऽनयः ।
वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो धर्मविदुत्तमः ॥ ४३ ॥
वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः ।
हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ॥ ४४ ॥
ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः ।
उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ॥ ४५ ॥
विस्तारः स्थावरस्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम् ।
अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ॥ ४६ ॥
अनिर्विण्णः स्थविष्ठोऽभूर्धर्मयूपो महामखः ।
नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः ॥ ४७ ॥
यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः ।
सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ॥ ४८ ॥
सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत् ।
मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः ॥ ४९ ॥
स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत् ।
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ॥ ५० ॥
धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम् ।
अविज्ञाता सहस्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः ॥ ५१ ॥
गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः ।
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः ॥ ५२ ॥
उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः ।
शरीरभूतभृद्भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः ॥ ५३ ॥
सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः ।
विनयो जयः सत्यसन्धो दाशार्हः सात्वताम्पतिः ॥ ५४ ॥
जीवो विनयिता साक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः ।
अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशयोऽन्तकः ॥ ५५ ॥
अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः ।
आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ॥ ५६ ॥
महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः ।
त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाशृङ्गः कृतान्तकृत् ॥ ५७ ॥
महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी ।
गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः ॥ ५८ ॥
वेधाः स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढः सङ्कर्षणोऽच्युतः ।
वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ॥ ५९ ॥
भगवान् भगहाऽऽनन्दी वनमाली हलायुधः ।
आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः ॥ ६० ॥
सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः ।
दिवस्पृक् सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः ॥ ६१ ॥
त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक् ।
संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम् ॥ ६२ ॥
शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः ।
गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ॥ ६३ ॥
अनिवर्ती निवृत्तात्मा सङ्क्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः ।
श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतांवरः ॥ ६४ ॥
श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः ।
श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः ॥ ६५ ॥
स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः ।
विजितात्माऽविधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः ॥ ६६ ॥
उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः ।
भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ॥ ६७ ॥
अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः ।
अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ॥ ६८ ॥
कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः ।
त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः ॥ ६९ ॥
कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः ।
अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनञ्जयः ॥ ७० ॥
ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद् ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः ।
ब्रह्मविद् ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ॥ ७१ ॥
महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः ।
महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ॥ ७२ ॥
स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः ।
पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ॥ ७३ ॥
मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः ।
वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ॥ ७४ ॥
सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः ।
शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ॥ ७५ ॥
भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः ।
दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः ॥ ७६ ॥
विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान् ।
अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ॥ ७७ ॥
एको नैकः सवः कः किं यत् तत्पदमनुत्तमम् ।
लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ॥ ७८ ॥
सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी ।
वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः ॥ ७९ ॥
अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक् ।
सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ॥ ८० ॥
तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकशृङ्गो गदाग्रजः ॥ ८१ ॥
चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः ।
चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात् ॥ ८२ ॥
समावर्तोऽनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः ।
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा ॥ ८३ ॥
शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः ।
इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ॥ ८४ ॥
उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः ।
अर्को वाजसनः शृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी ॥ ८५ ॥
सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः ।
महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः ॥ ८६ ॥
कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः ।
अमृताशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ॥ ८७ ॥
सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः ।
न्यग्रोधोऽदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः ॥ ८८ ॥
सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः ।
अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः ॥ ८९ ॥
अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् ।
अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः ॥ ९० ॥
भारभृत् कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः ।
आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ॥ ९१ ॥
धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः ।
अपराजितः सर्वसहो नियन्ताऽनियमोऽयमः ॥ ९२ ॥
सत्त्ववान् सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः ।
अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियकृत् प्रीतिवर्धनः ॥ ९३ ॥
विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः ।
रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ॥ ९४ ॥
अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः ।
अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः ॥ ९५ ॥
सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः ।
स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्ति स्वस्तिभुक्स्वस्तिदक्षिणः ॥ ९६ ॥
अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः ।
शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ॥ ९७ ॥
अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणांवरः ।
विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥ ९८ ॥
उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः ।
वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः ॥ ९९ ॥
अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः ।
चतुरश्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ॥ १०० ॥
अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः ।
जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः ॥ १०१ ॥
आधारनिलयोऽधाता पुष्पहासः प्रजागरः ।
ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ॥ १०२ ॥
प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत्प्राणजीवनः ।
तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः ॥ १०३ ॥
भूर्भुवःस्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः ।
यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः ॥ १०४ ॥
यज्ञभृद् यज्ञकृद् यज्ञी यज्ञभुग् यज्ञसाधनः ।
यज्ञान्तकृद् यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ॥ १०५ ॥
आत्मयोनिः स्वयञ्जातो वैखानः सामगायनः ।
देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ॥ १०६ ॥
शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः ।
रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ॥ १०७ ॥
सर्वप्रहरणायुध ॐ नम इति ।
वनमाली गदी शार्ङ्गी शङ्खी चक्री च नन्दकी ।
श्रीमान् नारायणो विष्णुर्वासुदेवोऽभिरक्षतु ॥ १०८ ॥
श्रीवासुदेवोऽभिरक्षतु ॐ नम इति ।
फलश्रुति
भीष्म उवाच
इतीदं कीर्तनीयस्य केशवस्य महात्मनः ।
नाम्नां सहस्रं दिव्यानामशेषेण प्रकीर्तितम् ॥ १ ॥
य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत् ।
नाशुभं प्राप्नुयात्किञ्चित्सोऽमुत्रेह च मानवः ॥ २ ॥
वेदान्तगो ब्राह्मणः स्यात्क्षत्रियो विजयी भवेत् ।
वैश्यो धनसमृद्धः स्याच्छूद्रः सुखमवाप्नुयात् ॥ ३ ॥
धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात् ।
कामानवाप्नुयात्कामी प्रजार्थी प्राप्नुयात्प्रजाम् ॥ ४ ॥
भक्तिमान् यः सदोत्थाय शुचिस्तद्गतमानसः ।
सहस्रं वासुदेवस्य नाम्नामेतत्प्रकीर्तयेत् ॥ ५ ॥
यशः प्राप्नोति विपुलं ज्ञातिप्राधान्यमेव च ।
अचलां श्रियमाप्नोति श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ ६ ॥
न भयं क्वचिदाप्नोति वीर्यं तेजश्च विन्दति ।
भवत्यरोगो द्युतिमान्बलरूपगुणान्वितः ॥ ७ ॥
रोगार्तो मुच्यते रोगाद्बद्धो मुच्येत बन्धनात् ।
भयान्मुच्येत भीतस्तु मुच्येतापन्न आपदः ॥ ८ ॥
दुर्गाण्यतितरत्याशु पुरुषः पुरुषोत्तमम् ।
स्तुवन्नामसहस्रेण नित्यं भक्तिसमन्वितः ॥ ९ ॥
वासुदेवाश्रयो मर्त्यो वासुदेवपरायणः ।
सर्वपापविशुद्धात्मा याति ब्रह्म सनातनम् ॥ १० ॥
न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित् ।
जन्ममृत्युजराव्याधिभयं नैवोपजायते ॥ ११ ॥
इमं स्तवमधीयानः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः ।
युज्येतात्मसुखक्षान्तिश्रीधृतिस्मृतिकीर्तिभिः ॥ १२ ॥
न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः ।
भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां पुरुषोत्तमे ॥ १३ ॥
द्यौः सचन्द्रार्कनक्षत्रा खं दिशो भूर्महोदधिः ।
वासुदेवस्य वीर्येण विधृतानि महात्मनः ॥ १४ ॥
ससुरासुरगन्धर्वं सयक्षोरगराक्षसम् ।
जगद्वशे वर्ततेदं कृष्णस्य सचराचरम् ॥ १५ ॥
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सत्त्वं तेजो बलं धृतिः ।
वासुदेवात्मकान्याहुः क्षेत्रं क्षेत्रज्ञ एव च ॥ १६ ॥
सर्वागमानामाचारः प्रथमं परिकल्प्यते ।
आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः ॥ १७ ॥
ऋषयः पितरो देवा महाभूतानि धातवः ।
जङ्गमाजङ्गमं चेदं जगन्नारायणोद्भवम् ॥ १८ ॥
योगो ज्ञानं तथा साङ्ख्यं विद्याः शिल्पादिकर्म च ।
वेदाः शास्त्राणि विज्ञानमेतत्सर्वं जनार्दनात् ॥ १९ ॥
एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकशः ।
त्रींल्लोकान्व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः ॥ २० ॥
इमं स्तवं भगवतो विष्णोर्व्यासेन कीर्तितम् ।
पठेद्य इच्छेत्पुरुषः श्रेयः प्राप्तुं सुखानि च ॥ २१ ॥
विश्वेश्वरमजं देवं जगतः प्रभुमव्ययम् ।
भजन्ति ये पुष्कराक्षं न ते यान्ति पराभवम् ॥ २२ ॥
न ते यान्ति पराभवम् ॐ नम इति ।
अर्जुन उवाच
पद्मपत्रविशालाक्ष पद्मनाभ सुरोत्तम ।
भक्तानामनुरक्तानां त्राता भव जनार्दन ॥ २३ ॥
श्रीभगवानुवाच
यो मां नामसहस्रेण स्तोतुमिच्छति पाण्डव ।
सोऽहमेकेन श्लोकेन स्तुत एव न संशयः ॥ २४ ॥
स्तुत एव न संशय ॐ नम इति ।
व्यास उवाच
वासनाद्वासुदेवस्य वासितं भुवनत्रयम् ।
सर्वभूतनिवासोऽसि वासुदेव नमोऽस्तु ते ॥ २५ ॥
श्रीवासुदेव नमोऽस्तु त ॐ नम इति ।
पार्वत्युवाच
केनोपायेन लघुना विष्णोर्नामसहस्रकम् ।
पठ्यते पण्डितैर्नित्यं श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥ २६ ॥
ईश्वर उवाच
श्रीरामरामरामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनामतत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥ २७ ॥
श्रीरामनाम वरानन ॐ नम इति ।
ब्रह्मोवाच
नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये
सहस्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे ।
सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते
सहस्रकोटियुगधारिणे नमः ॥ २८ ॥
सहस्रकोटियुगधारिणे नम ॐ नम इति ।
ॐ तत्सदिति श्रीमहाभारते शतसाहस्र्यां संहितायां वैयासिक्यामानुशासनिके पर्वणि भीष्मयुधिष्ठिरसंवादे श्रीविष्णोर्दिव्यसहस्रनामस्तोत्रम् ॥
सञ्जय उवाच
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ २९ ॥
श्रीभगवानुवाच
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ ३० ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ ३१ ॥
आर्ता विषण्णाः शिथिलाश्च भीता घोरेषु च व्याधिषु वर्तमानाः ।
सङ्कीर्त्य नारायणशब्दमात्रं विमुक्तदुःखाः सुखिनो भवन्ति ॥ ३२ ॥
कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात् ।
करोमि यद्यत् सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयामि ॥ ३३ ॥
इति श्रीविष्णोर्दिव्यसहस्रनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।
ॐ तत् सत् ॥
समापन श्लोक
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम् ।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥
आर्तानामार्तिहन्तारं भीतानां भीतिनाशनम् ।
द्विषतां कालदण्डं तं रामचन्द्रं नमाम्यहम् ॥
अच्युतानन्तगोविन्दनामोच्चारणभेषजात् ।
नश्यन्ति सकला रोगास्सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥
शरीरे जर्जरीभूते व्याधिग्रस्ते कलेवरे ।
औषधं जाह्नवीतोयं वैद्यो नारायणो हरिः ॥
आलोड्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः ।
इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणो हरिः ॥
यदक्षरपदभ्रष्टं मात्राहीनं तु यद्भवेत् ।
तत्सर्वं क्षम्यतां देव नारायण नमोऽस्तु ते ॥
विसर्गबिन्दुमात्राणि पदपादाक्षराणि च ।
न्यूनानि चातिरिक्तानि क्षमस्व पुरुषोत्तम ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥
प्रारंभिक और ध्यान श्लोक
ॐ श्रीपरमात्मने नमः ।
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
अर्थ: नारायण, नर, नरोत्तम, देवी सरस्वती और महर्षि व्यास को नमस्कार करके ही महाभारत रूपी जय-गाथा या इस पावन पाठ का आरंभ करना चाहिए।
शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
अर्थ: श्वेत वस्त्र धारण करने वाले, चंद्रमा के समान उज्ज्वल वर्ण वाले, चार भुजाओं वाले और प्रसन्न मुख वाले भगवान विष्णु का समस्त विघ्नों की शांति के लिए ध्यान करना चाहिए।
यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात् ।
विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे ॥
अर्थ: जिनके स्मरण मात्र से जीव जन्म और संसार के बंधन से छूट जाता है, उन सर्वसमर्थ भगवान विष्णु को नमस्कार है।
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥
अर्थ: जिनका स्वरूप शांत है, जो शेषनाग पर शयन करते हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो देवताओं के स्वामी, विश्व के आधार, आकाश के समान व्यापक, मेघ के समान वर्ण वाले और सुंदर अंगों वाले हैं, जो लक्ष्मीजी के पति और कमल-नयन हैं, जिन्हें योगी ध्यान में पाते हैं और जो संसार के भय को हरने वाले तथा सब लोकों के एकमात्र स्वामी हैं, उन विष्णु की मैं वंदना करता हूँ।
भीष्म और युधिष्ठिर का संवाद (मुख्य श्लोक)
किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम् ।
स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम् ॥
को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः ।
किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात् ॥
अर्थ: युधिष्ठिर पूछते हैं कि इस संसार में एक ही देवता कौन है और एक ही परम आश्रय कौन है, किसकी स्तुति और पूजा करके मनुष्य कल्याण पाते हैं, आपके विचार से सब धर्मों में सर्वश्रेष्ठ धर्म कौन-सा है और क्या जपने से जीव जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त होता है।
जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम् ।
स्तुवन् नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः ॥
अर्थ: भीष्म उत्तर देते हैं कि जगत के स्वामी, देवों के देव, अनंत पुरुषोत्तम की सहस्र नामों से स्तुति करता हुआ मनुष्य सदा जागरूक और उन्नत रहता है।
एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः ।
यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा ॥
अर्थ: मेरे मत में सब धर्मों में यही सबसे श्रेष्ठ धर्म है कि मनुष्य भक्ति से कमलनयन भगवान की स्तुतियों के द्वारा सदा उनकी अर्चना करे।
ऋषिर्नाम्नां सहस्रस्य वेदव्यासो महामुनिः ।
छन्दोऽनुष्टुप् तथा देवो भगवान् देवकीसुतः ॥
अर्थ: इन सहस्र नामों के ऋषि महामुनि वेदव्यास हैं, छंद अनुष्टुप् है और देवता देवकी-नंदन भगवान हैं।
Vishnu sahasranamam lyrics in hindi arth
ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः ।
भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥ १ ॥
अर्थ: विश्व का रूप स्वयं वही हैं, वे सर्वव्यापक विष्णु हैं और यज्ञ के वषट्कार रूप हैं। वे भूत, वर्तमान और भविष्य, तीनों कालों के स्वामी हैं। वे प्राणियों की रचना करने वाले और उनका पालन करने वाले हैं, सबकी आत्मा हैं और सबको बढ़ाने वाले हैं।
पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः ।
अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥ २ ॥
अर्थ: वे पवित्र आत्मा हैं और परमात्मा हैं, मुक्त हुए जीवों की अंतिम गति हैं। वे अविनाशी हैं, सबके भीतर बसने वाले पुरुष हैं, सब कुछ देखने वाले साक्षी हैं, शरीर रूपी क्षेत्र के ज्ञाता हैं और कभी क्षीण न होने वाले अक्षर हैं।
योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः ।
नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः ॥ ३ ॥
अर्थ: वे स्वयं योग हैं और योग जानने वालों के मार्गदर्शक हैं। वे प्रकृति और पुरुष, दोनों के ईश्वर हैं। नृसिंह रूप धारण करने वाले, श्रीसंपन्न केशव और पुरुषों में सर्वश्रेष्ठ पुरुषोत्तम वही हैं।
सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः ।
सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥ ४ ॥
अर्थ: वे सब कुछ हैं, प्रलय के समय संहार करने वाले हैं, कल्याणकारी शिव हैं और अटल स्थाणु हैं। वे प्राणियों के आदि कारण हैं और ऐसे खज़ाने हैं जो कभी खत्म नहीं होता। वे स्वेच्छा से प्रकट होते हैं, सबको बढ़ाते और पालते हैं, सबके उत्पत्ति-स्थान और समर्थ ईश्वर हैं।
स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः ।
अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ॥ ५ ॥
अर्थ: वे स्वयं प्रकट हुए हैं, सुख देने वाले शम्भु हैं और सूर्य में स्थित आदित्य हैं। उनके नेत्र कमल जैसे हैं और उनका नाद गंभीर है। उनका न आदि है न अंत। वे सबको धारण करने वाले और विधान रचने वाले हैं, और धारण करने वाली सब शक्तियों में सर्वोत्तम हैं।
अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः ।
विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ॥ ६ ॥
अर्थ: उन्हें किसी प्रमाण से मापा नहीं जा सकता। वे इंद्रियों के स्वामी हृषीकेश हैं, पद्मनाभ हैं और देवताओं के प्रभु हैं। संपूर्ण विश्व की रचना उन्हीं का कर्म है। वे विचारशील मनु हैं, रूप गढ़ने वाले त्वष्टा हैं, अत्यंत विशाल और सबसे पुरातन हैं तथा अटल ध्रुव हैं।
अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः ।
प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम् ॥ ७ ॥
अर्थ: इंद्रियों से उन्हें पकड़ा नहीं जा सकता, वे शाश्वत हैं और सबको अपनी ओर खींचने वाले कृष्ण हैं। उनके नेत्रों में लालिमा है और वे प्रलय में सबका संहार करने वाले हैं। वे ऐश्वर्य से भरपूर हैं, तीनों दिशाओं के आश्रय हैं और पवित्र तथा परम मंगल रूप हैं।
ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः ।
हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥ ८ ॥
अर्थ: वे सबके नियंता ईशान हैं, प्राण देने वाले हैं और स्वयं प्राण रूप हैं। वे सबसे बड़े और सबसे श्रेष्ठ हैं, प्रजाओं के पति हैं। उन्हीं से स्वर्णिम सृष्टि प्रकट होती है और पृथ्वी उन्हीं के गर्भ में है। वे लक्ष्मीपति माधव हैं और मधु दैत्य का वध करने वाले मधुसूदन हैं।
ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः ।
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान् ॥ ९ ॥
अर्थ: वे सर्वसमर्थ ईश्वर हैं, पराक्रमी हैं और धनुषधारी हैं। उनकी बुद्धि तीक्ष्ण है और वे गरुड़ की तरह गति वाले हैं, सृष्टि का क्रम चलाने वाले हैं। उनसे श्रेष्ठ कोई नहीं, उन्हें कोई दबा नहीं सकता। वे किए हुए उपकार को जानने वाले हैं, स्वयं कर्म रूप हैं और अपने स्वरूप में स्थित हैं।
सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः ।
अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ॥ १० ॥
अर्थ: वे देवताओं के स्वामी हैं, शरण देने वाले हैं और स्वयं सुख रूप हैं। विश्व उन्हीं के बीज से उत्पन्न हुआ है और सब प्रजाओं के कारण वही हैं। वे दिन और वर्ष रूप काल हैं, सर्प की तरह पकड़ में न आने वाले हैं, ज्ञान रूप हैं और सब कुछ देखने वाले हैं।
अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः ।
वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिःसृतः ॥ ११ ॥
अर्थ: वे अजन्मा हैं, सबके ईश्वर हैं, स्वयं सिद्ध हैं और सिद्धि के फल हैं। वे सबके आदि हैं और अपने स्वरूप से कभी न गिरने वाले अच्युत हैं। वे धर्म को भी और जगत के हित को भी धारण करने वाले वृषाकपि हैं, जिनकी आत्मा को मापा नहीं जा सकता और जो सब संबंधों से परे हैं।
वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्माऽसम्मितः समः ।
अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ॥ १२ ॥
अर्थ: सब प्राणी उनमें बसते हैं और वे सबमें बसते हैं, उनका मन उदार है और वे सत्य रूप हैं। वे सबमें एक समान आत्मा हैं, किसी माप में नहीं समाते और सबके प्रति सम हैं। उनका कोई कर्म व्यर्थ नहीं जाता। वे कमलनयन हैं, उनके कर्म धर्ममय हैं और उनका रूप धर्म की मूर्ति है।
रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः ।
अमृतः शाश्वतस्थाणुर्वरारोहो महातपाः ॥ १३ ॥
अर्थ: प्रलय में संहार के समय वे रुद्र हैं और उनके अनेक सिर हैं। वे सबका भरण करने वाले बभ्रु हैं, विश्व के उत्पत्ति-स्थान हैं और जिनका यश पवित्र है। वे अमर और शाश्वत रूप से अटल हैं। वे श्रेष्ठ गति वाले हैं और उनका तप महान है।
सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः ।
वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित् कविः ॥ १४ ॥
अर्थ: वे सब जगह पहुँचने वाले और सब कुछ जानने वाले हैं, सूर्य के समान प्रकाश देने वाले हैं। उनकी सेना सब दिशाओं में फैली है। वे जनार्दन हैं, यानी दुष्टों को दंड देने वाले और भक्तों की रक्षा करने वाले। वे वेद हैं, वेद के ज्ञाता हैं, अंग-भंग से रहित हैं, वेद के अंग हैं और सब कुछ देखने वाले कवि हैं।
लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः ।
चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ॥ १५ ॥
अर्थ: वे लोकों के, देवताओं के और धर्म के अध्यक्ष हैं, और किए तथा न किए हुए, सब कर्मों के साक्षी हैं। वे चार रूपों वाले हैं, चार व्यूहों में प्रकट होते हैं, नृसिंह रूप में चार दाढ़ों वाले हैं और चार भुजाओं वाले हैं।
भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः ।
अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ॥ १६ ॥
अर्थ: वे स्वयं प्रकाशमान हैं, भोग्य पदार्थ भी हैं और भोगने वाले भी। वे सहनशील हैं और जगत के आरंभ में सबसे पहले प्रकट हुए हैं। वे पापरहित हैं, विजय रूप हैं और सबको जीतने वाले हैं। वे विश्व के योनि-स्थान हैं और बार-बार शरीरों में बसने वाले पुनर्वसु हैं।
उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरूर्जितः ।
अतीन्द्रः सङ्ग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ॥ १७ ॥
अर्थ: वे इंद्र के छोटे भाई उपेंद्र हैं और वामन अवतार हैं, जो आगे चलकर विराट रूप में प्रांशु यानी ऊँचे हो गए। उनका कोई कार्य व्यर्थ नहीं जाता। वे पवित्र हैं और अपार बल वाले हैं। वे इंद्र से भी परे हैं, सबको अपने में समेटने वाले हैं, सृष्टि का रूप हैं और अपने स्वरूप में दृढ़ हैं। वे नियमों का आधार नियम और संयम देने वाले यम हैं।
वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः ।
अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः ॥ १८ ॥
अर्थ: वे जानने योग्य हैं और जन्म-मरण का रोग मिटाने वाले वैद्य हैं। वे सदा योग में स्थित हैं और दुष्ट वीरों का नाश करने वाले हैं। वे माधव हैं और मधु के समान मधुर हैं। वे इंद्रियों की पहुँच से परे हैं, उनकी माया विशाल है और उनका उत्साह तथा बल भी महान है।
महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः ।
अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक् ॥ १९ ॥
अर्थ: उनकी बुद्धि, वीर्य, शक्ति और कांति सब महान हैं। उनके स्वरूप को शब्दों में नहीं बताया जा सकता। वे श्रीसंपन्न हैं और उनकी आत्मा अपरिमेय है। उन्होंने गोवर्धन और मंदराचल जैसे बड़े पर्वतों को धारण किया।
महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः ।
अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः ॥ २० ॥
अर्थ: वे महान धनुर्धर हैं और पृथ्वी को धारण करने वाले हैं। लक्ष्मी उनमें निवास करती हैं और वे सज्जनों की परम गति हैं। उन्हें कोई रोक नहीं सकता। वे देवताओं को आनंद देने वाले हैं। वे गोविंद हैं, यानी वाणी, गौ और भूमि के रक्षक, और ज्ञानियों के स्वामी हैं।
मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः ।
हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ॥ २१ ॥
अर्थ: वे तेजस्वियों के तेज हैं और दुष्टों का दमन करने वाले हैं। वे हंस रूप हैं, सुंदर पंखों वाले सुपर्ण हैं और सर्पों में श्रेष्ठ हैं। उनकी नाभि स्वर्णमयी है। वे उत्तम तप करने वाले हैं, पद्मनाभ हैं और प्रजाओं के पति हैं।
अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः सन्धाता सन्धिमान् स्थिरः ।
अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ॥ २२ ॥
अर्थ: उनके लिए मृत्यु नहीं है और वे सब कुछ देखते हैं। वे दुष्टों का संहार करने वाले सिंह हैं और कर्म तथा फल को जोड़ने वाले हैं। वे स्थिर हैं और अजन्मा हैं। उनका सामना करना किसी के लिए सरल नहीं। वे सबको अनुशासन में रखने वाले हैं, प्रसिद्ध आत्मा वाले हैं और देवताओं के शत्रुओं का नाश करने वाले हैं।
गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः ।
निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ॥ २३ ॥
अर्थ: वे गुरु हैं और गुरुओं के भी गुरु। वे सबके परम धाम हैं और सत्य रूप हैं, उनका पराक्रम कभी विफल नहीं होता। वे आँखें मूँदे हुए योगनिद्रा में भी हैं और सदा जागृत भी। वे वैजयंती माला पहनते हैं। वे वाणी के स्वामी हैं और उनकी बुद्धि उदार है।
अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान् न्यायो नेता समीरणः ।
सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ २४ ॥
अर्थ: वे सबको आगे ले जाने वाले हैं और सबको संगठित रखने वाले हैं। वे श्रीसंपन्न हैं और न्याय रूप हैं। वे सबका नेतृत्व करते हैं और वायु बनकर प्राणियों को जीवित रखते हैं। उनके हज़ार सिर, हज़ार आँखें और हज़ार पैर हैं, और वे सारे विश्व की आत्मा हैं।
आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः ।
अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः ॥ २५ ॥
अर्थ: वे संसार-चक्र को घुमाने वाले हैं, पर स्वयं उसमें लिप्त नहीं होते। वे माया से ढके हुए हैं और दुष्टों को कुचल देने वाले हैं। वे दिन के रूप में चक्र चलाने वाले हैं। वे अग्नि हैं, वायु हैं और पृथ्वी को धारण करने वाले हैं।
सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः ।
सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः ॥ २६ ॥
अर्थ: वे सहज ही प्रसन्न हो जाते हैं और उनका मन सदा प्रसन्न रहता है। वे विश्व को धारण करने वाले और उसका पालन करने वाले हैं, सर्वव्यापक विभु हैं। वे सज्जनों का सम्मान करने वाले हैं और स्वयं सबके द्वारा पूजित हैं। वे साधु स्वभाव के हैं, अधर्मियों का नाश करने वाले जह्नु हैं, और नारायण तथा नर, दोनों रूपों में पूजित हैं।
असङ्ख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः ।
सिद्धार्थः सिद्धसङ्कल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः ॥ २७ ॥
अर्थ: उनके नामों और रूपों की गिनती नहीं हो सकती और उनकी आत्मा को मापा नहीं जा सकता। वे सबसे विशिष्ट हैं और सज्जनों का पालन करने वाले हैं। वे पवित्र हैं। उनके सब प्रयोजन सिद्ध हैं और उनके संकल्प कभी निष्फल नहीं होते। वे सिद्धि देने वाले हैं और सिद्धि का साधन भी वही हैं।
वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः ।
वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ॥ २८ ॥
अर्थ: धर्म ही उनका दिन-प्रतिदिन का आचरण है और वे धर्म की वर्षा करने वाले वृषभ हैं। वे सर्वव्यापक विष्णु हैं। धर्म तक पहुँचाने वाली सीढ़ियाँ उन्हीं का रूप हैं और उनके उदर में धर्म रूपी जल भरा है। वे सबको बढ़ाने वाले हैं और स्वयं भी बढ़ते हैं। वे संसार से अलग शुद्ध स्वरूप में रहने वाले और वेदों के सागर हैं।
सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः ।
नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ॥ २९ ॥
अर्थ: उनकी भुजाएँ सुंदर और बलवान हैं और उन्हें कोई रोक नहीं सकता। वे वाणी के धनी हैं। वे इंद्र के भी इंद्र हैं, धन देने वाले हैं और स्वयं धन रूप भी हैं। वे अनेक रूप धारण करते हैं, उनका रूप विशाल है और वे यज्ञ में पशु रूप किरणों में समाए हैं। वे सबको प्रकाशित करने वाले हैं।
ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः ।
ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः ॥ ३० ॥
अर्थ: वे बल, तेज और कांति को धारण करने वाले हैं। उनकी आत्मा प्रकाश रूप है और वे अपने प्रताप से तपाने वाले हैं। वे ऐश्वर्य से भरे हैं और ॐ जैसे स्पष्ट अक्षर वाले मंत्र हैं। उनकी शीतलता चंद्रमा की किरणों जैसी है और तेज सूर्य जैसा है।
अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः ।
औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः ॥ ३१ ॥
अर्थ: समुद्र-मंथन में उनसे चंद्रमा प्रकट हुआ। वे सूर्य रूप में चमकने वाले भानु हैं और चंद्रमा में खरगोश के चिह्न वाले शशबिन्दु हैं। वे देवताओं के ईश्वर हैं। वे जन्म-मरण के रोग की औषधि हैं और संसार-सागर पार कराने वाले सेतु हैं। उनके धर्म और पराक्रम दोनों सत्य हैं।
भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽनलः ।
कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः ॥ ३२ ॥
अर्थ: वे भूत, भविष्य और वर्तमान के नाथ हैं। वे वायु हैं, पवित्र करने वाले हैं और अग्नि रूप हैं। वे भक्तों की सांसारिक कामनाओं का नाश करते हैं और उनकी सही कामनाओं को पूरा भी करते हैं। वे अत्यंत सुंदर हैं और स्वयं सबके चाहने योग्य हैं। वे मनोकामना देने वाले प्रभु हैं।
युगादिकृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः ।
अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित् ॥ ३३ ॥
अर्थ: वे युगों का आरंभ करने वाले हैं और उन्हीं से युग-चक्र घूमता है। उनकी माया अनेक रूपों में फैली है और वे प्रलय में सबको ग्रास बना लेने वाले हैं। वे आँखों से दिखाई नहीं देते, फिर भी अवतार रूप में प्रकट होते हैं। वे हज़ारों और अनंत शत्रुओं को जीतने वाले हैं।
इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः ।
क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः ॥ ३४ ॥
अर्थ: वे परम प्रिय हैं, फिर भी सबमें समान रूप से विद्यमान होने से उनमें कोई विशेष भेद नहीं। वे सज्जनों के प्रिय हैं और मोर-पंख धारण करने वाले शिखंडी हैं। वे सबको माया से बाँधने वाले नहुष हैं और धर्म रूप वृष हैं। वे भक्तों के क्रोध का नाश करते हैं और दुष्टों पर क्रोध भी करते हैं। वे सब कुछ करने वाले हैं, सब ओर भुजाओं वाले हैं और पृथ्वी को धारण करने वाले हैं।
अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः ।
अपांनिधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ॥ ३५ ॥
अर्थ: वे कभी स्थान से नहीं गिरते और सृष्टि, पालन तथा संहार के कारण प्रसिद्ध हैं। वे प्राण हैं और प्राण देने वाले हैं। वे इंद्र के अनुज वामन हैं। वे जल के निधि समुद्र के रूप में हैं और सबके आधार हैं। वे कभी असावधान नहीं होते और अपने स्वरूप में सदा प्रतिष्ठित हैं।
स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः ।
वासुदेवो बृहद्भानुरादिदेवः पुरन्दरः ॥ ३६ ॥
अर्थ: वे कार्तिकेय रूप में स्कंद हैं और धर्म के मार्ग को धारण करने वाले हैं। वे जगत के भार को उठाने वाले हैं और वर माँगने पर वरदान देने वाले हैं। वे वायु के भी प्रेरक हैं। वे वासुदेव हैं, यानी सब प्राणियों में बसने वाले, और उनके तेज में अपार प्रकाश है। वे सबके आदि देव हैं और असुरों के नगर तोड़ने वाले पुरंदर हैं।
अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः ।
अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ॥ ३७ ॥
अर्थ: वे शोक से रहित हैं और भक्तों को संसार-सागर से पार कराने वाले हैं। वे स्वयं तारने वाले मंत्र ॐ रूप हैं। वे शूरवीर हैं और शूरकुल में जन्मे शौरि हैं। वे सब मनुष्यों के स्वामी हैं और सदा भक्तों के अनुकूल रहते हैं। उनके सैकड़ों अवतार होते हैं। वे हाथ में कमल धारण करते हैं और उनकी आँखें कमल के समान हैं।
पद्मनाभोऽरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत् ।
महर्द्धिरृद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः ॥ ३८ ॥
अर्थ: उनकी नाभि में कमल है, आँखें कमल के समान हैं और वे हृदय-कमल में पूजे जाते हैं। वे सब शरीरों को धारण करने और पोषण करने वाले हैं। उनकी ऋद्धि महान है और वे सदा वृद्धि को प्राप्त हैं। वे सबसे पुरातन आत्मा हैं। उनकी आँखें विशाल हैं और उनके ध्वज पर गरुड़ है।
अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः ।
सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान् समितिञ्जयः ॥ ३९ ॥
अर्थ: उनकी कोई तुलना नहीं हो सकती। वे शरभ रूप में प्रकट होने वाले हैं और दुष्टों के लिए भयंकर हैं। वे समय और मर्यादा के ज्ञाता हैं। वे यज्ञ की आहुति भी हैं और उसे ग्रहण करने वाले हरि भी। वे सब शुभ लक्षणों से युक्त हैं, लक्ष्मी के साथ रहते हैं और युद्ध में विजय पाने वाले हैं।
विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः ।
महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः ॥ ४० ॥
अर्थ: वे संसार में सब ओर बिखरे हुए रूप वाले हैं और मत्स्य रूप में रोहित हैं। वे मोक्ष का मार्ग हैं और सृष्टि के कारण हैं। यशोदा माता के बाँधने की लीला से वे दामोदर कहलाए। वे सब कुछ सहने वाले हैं और पृथ्वी को धारण करने वाले हैं। उनका भाग्य महान है और उनका वेग तेज है। वे प्रलय में सब कुछ निगल लेने वाले हैं।
उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः ।
करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः ॥ ४१ ॥
अर्थ: वे सृष्टि के उत्पत्ति-स्थान हैं और सृष्टि के आरंभ में प्रकृति और पुरुष में हलचल पैदा करने वाले हैं। उनके गर्भ में लक्ष्मी और सारा ऐश्वर्य है। वे सबके परम ईश्वर हैं। वे साधन भी हैं, कारण भी हैं, कर्ता भी हैं और विविध रूप रचने वाले भी। उन्हें गहराई से ही जाना जा सकता है और वे हृदय की गुफा में छिपे हुए हैं।
व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः ।
परर्द्धिः परमस्पष्टस्तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ॥ ४२ ॥
अर्थ: वे दृढ़ निश्चय रूप हैं और सबको उसके स्थान पर व्यवस्थित करने वाले हैं। वे सबके अंतिम आश्रय हैं और सबको उसका उचित स्थान देने वाले हैं। वे अटल हैं और उनका ऐश्वर्य सर्वोच्च है। वे अत्यंत स्पष्ट रूप से जाने जा सकते हैं, सदा संतुष्ट रहते हैं और परिपूर्ण हैं। उनकी दृष्टि शुभ है।
रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नयोऽनयः ।
वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो धर्मविदुत्तमः ॥ ४३ ॥
अर्थ: वे योगियों के मन को रमाने वाले राम हैं और सब प्राणियों के विश्राम-स्थान हैं। वे रजोगुण से रहित हैं और मार्ग हैं। वे ही जानने योग्य हैं, वे ही दूसरों को चलाने वाली नीति हैं और स्वयं किसी की नीति से परे हैं। वे वीर हैं और शक्तिशालियों में श्रेष्ठ हैं। वे धर्म रूप हैं और धर्म जानने वालों में सर्वोत्तम हैं।
वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः ।
हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ॥ ४४ ॥
अर्थ: वे वैकुण्ठ हैं, यानी संसार की सब वस्तुओं को जोड़ने वाले, और सबके भीतर बसने वाले पुरुष हैं। वे प्राण हैं और प्राण देने वाले हैं। वे ॐकार रूप प्रणव हैं और विशाल पृथु हैं। वे सृष्टि के गर्भ हिरण्यगर्भ हैं और शत्रुओं का नाश करने वाले हैं। वे सब जगह फैले हुए हैं, वायु रूप हैं और इंद्रियों की पहुँच से परे अधोक्षज हैं।
ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः ।
उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ॥ ४५ ॥
अर्थ: वे ऋतुओं के रूप हैं और सुंदर दर्शन वाले हैं, काल रूप हैं और अपने परम स्थान में प्रतिष्ठित परमेष्ठी हैं। वे भक्तों के अर्पण को स्वीकार करने वाले हैं। वे उग्र हैं और वर्ष रूप हैं। वे कुशल हैं, सब जीवों के विश्राम-स्थान हैं और सब पर उदारता करने वाले हैं।
विस्तारः स्थावरस्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम् ।
अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ॥ ४६ ॥
अर्थ: वे संपूर्ण जगत का विस्तार हैं और स्थिर तथा अटल हैं। वे स्वयं प्रमाण हैं और सृष्टि के अविनाशी बीज हैं। वे भक्तों के परम प्रयोजन हैं और स्वयं किसी प्रयोजन से परे हैं। उनका खज़ाना विशाल है, उनका आनंद महान है और उनका धन अपार है।
अनिर्विण्णः स्थविष्ठोऽभूर्धर्मयूपो महामखः ।
नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः ॥ ४७ ॥
अर्थ: उन्हें किसी बात की ऊब या खेद नहीं होता। वे विशाल हैं और जन्म नहीं लेते। वे धर्म रूपी यज्ञ-स्तंभ हैं और स्वयं महान यज्ञ हैं। वे नक्षत्रों के केंद्र हैं और चंद्रमा रूप में नक्षत्रों के स्वामी हैं। वे सब कुछ सहन करने में समर्थ हैं और प्रलय में सबको क्षीण कर देने वाले हैं। वे सृष्टि की इच्छा करने वाले हैं।
यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः ।
सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ॥ ४८ ॥
अर्थ: वे स्वयं यज्ञ हैं और पूजा के योग्य हैं, महान पूजनीय हैं। वे क्रतु और सत्र जैसे यज्ञ रूप हैं और सज्जनों की परम गति हैं। वे सब कुछ देखने वाले हैं, बंधन से मुक्त आत्मा हैं और सब कुछ जानते हैं। वे सर्वोत्तम ज्ञान हैं।
सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत् ।
मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः ॥ ४९ ॥
अर्थ: उनके व्रत श्रेष्ठ हैं और उनका मुख सुंदर तथा प्रसन्न है। वे अत्यंत सूक्ष्म हैं और उनकी वाणी मधुर तथा गंभीर है। वे सुख देने वाले हैं और बिना किसी स्वार्थ के सबके मित्र हैं। वे मन को हर लेने वाले हैं और उन्होंने क्रोध को जीता है। उनकी भुजाएँ वीर और बलवान हैं और वे अधर्मियों को चीर देने वाले हैं।
स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत् ।
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ॥ ५० ॥
अर्थ: वे अज्ञान की निद्रा में जीवों को सुलाने वाले हैं और स्वयं अपने वश में हैं, किसी और के अधीन नहीं। वे सर्वव्यापी हैं, अनेक रूप धारण करते हैं और अनेक कर्म करने वाले हैं। वे सबके निवास-स्थान हैं और भक्तों पर वात्सल्य रखने वाले हैं। वे जगत रूपी बछड़ों के पालक हैं। उनके गर्भ में रत्न हैं और वे धन के स्वामी हैं।
धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम् ।
अविज्ञाता सहस्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः ॥ ५१ ॥
अर्थ: वे धर्म की रक्षा करने वाले, धर्म का आचरण करने वाले और धर्म को धारण करने वाले हैं। वे सत्, असत्, क्षर और अक्षर, सबके रूप हैं। साधारण जीव की तरह वे अज्ञान से नहीं बँधे हैं। वे हज़ार किरणों वाले सूर्य रूप हैं और सबका विधान करने वाले हैं। उन्होंने सृष्टि के लिए सब लक्षण रचे हैं।
गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः ।
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः ॥ ५२ ॥
अर्थ: वे सूर्य की किरणों के केंद्र हैं और सत्वगुण में स्थित हैं। वे सिंह की तरह पराक्रमी हैं और सब प्राणियों के महान ईश्वर हैं। वे आदि देव हैं, महादेव हैं और देवताओं के स्वामी हैं। वे देवताओं का भरण-पोषण करने वाले गुरु हैं।
उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः ।
शरीरभूतभृद्भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः ॥ ५३ ॥
अर्थ: वे संसार-सागर से उत्तीर्ण कराने वाले उत्तर हैं। वे गायों और इंद्रियों के पति हैं और सबकी रक्षा करने वाले हैं। वे ज्ञान से ही प्राप्त होने वाले और सबसे पुरातन हैं। वे शरीर बनाने वाले पंचभूतों को भी धारण करते हैं और जीव के रूप में भोक्ता भी हैं। वे वानरराज श्रीराम रूप में कपियों के स्वामी हैं और यज्ञों में प्रचुर दक्षिणा देने वाले हैं।
सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः ।
विनयो जयः सत्यसन्धो दाशार्हः सात्वताम्पतिः ॥ ५४ ॥
अर्थ: वे यज्ञ में सोम पीने वाले हैं और अमृत रूप में आत्मरस का पान करते हैं। वे चंद्रमा रूप में सोम हैं। उन्होंने बहुतों को जीता है और वे श्रेष्ठ पुरुषों में भी सर्वश्रेष्ठ हैं। वे दुष्टों को विनय सिखाते हैं और स्वयं विजय रूप हैं। उनके संकल्प सत्य हैं। वे दाशार्ह कुल में जन्मे और यादवों के स्वामी हैं।
जीवो विनयिता साक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः ।
अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशयोऽन्तकः ॥ ५५ ॥
अर्थ: वे जीव रूप में सबको जीवित रखते हैं और सबको नियम में चलाने वाले हैं। वे सबके साक्षी हैं और मुक्ति देने वाले मुकुंद हैं। उनका पराक्रम अपार है। वे जल के निधि समुद्र रूप हैं और उनकी आत्मा अनंत है। वे महासागर में शयन करने वाले हैं और प्रलय में सबका अंत करने वाले हैं।
अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः ।
आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ॥ ५६ ॥
अर्थ: वे अजन्मा हैं और सबसे अधिक पूजा के योग्य हैं। वे सदा अपने स्वभाव में स्थित हैं और उन्होंने शत्रुओं को जीत लिया है। वे सबको आनंद देने वाले हैं और स्वयं आनंद रूप हैं। वे सबको प्रसन्न करने वाले हैं और परम आनंद से संपन्न हैं। उनका धर्म सत्य है और उन्होंने वामन रूप में तीन डगों में तीनों लोक नाप लिए।
महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः ।
त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाशृङ्गः कृतान्तकृत् ॥ ५७ ॥
अर्थ: वे महर्षि कपिल के रूप में सांख्य के आचार्य हैं। वे किए हुए को जानने वाले हैं और पृथ्वी के स्वामी हैं। वे तीन पदों से जाने जाने वाले हैं और देवताओं के अध्यक्ष हैं। मत्स्य अवतार में उनके विशाल सींग थे। वे कर्मों का अंत करने वाले हैं।
महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी ।
गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः ॥ ५८ ॥
अर्थ: वे महान वराह हैं, जिन्होंने पृथ्वी का उद्धार किया। वे गोविंद हैं और उनकी सेना श्रेष्ठ है। उन्होंने सोने का बाजूबंद पहन रखा है। उन्हें जानना कठिन है, वे गंभीर हैं, उनके स्वरूप की थाह नहीं मिलती और वे सबसे छिपे हुए हैं। वे हाथ में चक्र और गदा धारण करते हैं।
वेधाः स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढः सङ्कर्षणोऽच्युतः ।
वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ॥ ५९ ॥
अर्थ: वे सृष्टि की रचना करने वाले वेधा हैं और उनके अंग सुंदर हैं। उन्हें कोई जीत नहीं सकता। वे कृष्ण हैं और दृढ़ हैं। वे संकर्षण हैं, जो प्रलय में सब कुछ अपनी ओर खींच लेते हैं। वे अच्युत हैं। वे वरुण हैं और वरुण के पुत्र वशिष्ठ रूप में भी हैं। वे संसार-वृक्ष हैं और कमल जैसी आँखों वाले हैं। उनका मन महान है।
भगवान् भगहाऽऽनन्दी वनमाली हलायुधः ।
आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः ॥ ६० ॥
अर्थ: वे छह ऐश्वर्यों से संपन्न भगवान हैं और प्रलय में उन ऐश्वर्यों को समेट लेने वाले भी हैं। वे परम आनंद वाले हैं। वे वनमाला पहनने वाले हैं और हल को शस्त्र रूप में धारण करने वाले हलायुध यानी बलराम हैं। वे अदिति के पुत्र वामन हैं और सूर्य मंडल में स्थित ज्योति हैं। वे सब कुछ सहने वाले हैं और श्रेष्ठ गति देने वाले हैं।
सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः ।
दिवस्पृक् सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः ॥ ६१ ॥
अर्थ: उनका धनुष उत्तम है और उनका फरसा शत्रुओं को खंड-खंड कर देने वाला है। वे दुष्टों के लिए कठोर हैं और भक्तों को धन देने वाले हैं। वे आकाश को छूने वाले हैं और सब कुछ देखने वाले हैं। वे वेदव्यास रूप में वेदों का विभाग करने वाले हैं। वे वाणी के स्वामी हैं और बिना योनि के प्रकट होने वाले हैं।
त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक् ।
संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम् ॥ ६२ ॥
अर्थ: वे तीन सामों से स्तुति किए जाने वाले हैं और सामवेद का गान करने वाले हैं। वे स्वयं साम हैं और परम शांति रूप निर्वाण हैं। वे संसार के रोग की औषधि हैं और उसका उपचार करने वाले वैद्य हैं। वे संन्यास का उपदेश देने वाले हैं और मन को शांत करने वाले हैं। वे शांत स्वरूप हैं, सबकी अंतिम निष्ठा हैं और शांति रूप हैं। वे सबके परम आश्रय हैं।
शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः ।
गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ॥ ६३ ॥
अर्थ: उनके अंग शुभ हैं और वे शांति देने वाले हैं। वे सृष्टि के रचयिता हैं। वे पृथ्वी को आनंद देने वाले कुमुद हैं और जल पर शयन करने वाले हैं। वे गायों का हित करने वाले हैं, गायों और इंद्रियों के स्वामी हैं और सबकी रक्षा करने वाले हैं। उनके नेत्र वृषभ की तरह शक्तिशाली हैं और वे धर्म को प्रिय मानने वाले हैं।
अनिवर्ती निवृत्तात्मा सङ्क्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः ।
श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतांवरः ॥ ६४ ॥
अर्थ: वे युद्ध या सत्य के मार्ग से कभी पीछे नहीं हटते। उनका मन विषयों से निवृत्त है। वे प्रलय में सृष्टि को समेटने वाले हैं और भक्तों का कल्याण करने वाले हैं। वे शिव, यानी मंगलमय हैं। उनके वक्ष पर श्रीवत्स का चिह्न है। लक्ष्मी उनमें निवास करती हैं और वे लक्ष्मी के पति हैं। वे श्रीमानों में भी श्रेष्ठ हैं।
श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः ।
श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः ॥ ६५ ॥
अर्थ: इस श्लोक के लगभग सभी नाम “श्री” यानी ऐश्वर्य, शोभा और लक्ष्मी से जुड़े हैं। श्रीद और श्रीकर भक्तों को ऐश्वर्य देने वाले हैं। श्रीश लक्ष्मी के स्वामी हैं और श्रीनिवास वे हैं जिनमें श्री का वास है। श्रीनिधि शोभा के भंडार हैं और श्रीधर वे हैं जिन्होंने लक्ष्मी को अपने वक्ष पर धारण किया है। श्रेय कल्याण का रूप है और लोकत्रयाश्रय का अर्थ है तीनों लोकों का एकमात्र आधार।
स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः ।
विजितात्मा विधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः ॥ ६६ ॥
अर्थ: स्वक्ष सुंदर नेत्रों वाले और स्वङ्ग सुंदर अंगों वाले हैं। शतानन्द वे हैं जो आनंद स्वरूप होकर अनेक रूपों में आनंद देते हैं, और नन्दि का अर्थ आनंदमय है। ज्योतिर्गणेश्वर सभी प्रकाशमान तेजों के स्वामी हैं। विजितात्मा ने अपने मन को जीत लिया है, विधेयात्मा किसी के वश में नहीं हैं, सत्कीर्ति की कीर्ति सच्ची है, और छिन्नसंशय वे हैं जिनके लिए कोई संशय नहीं है।
उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः ।
भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ॥ ६७ ॥
अर्थ: उदीर्ण सबसे उत्कृष्ट हैं और सर्वतश्चक्षु सब ओर देखने वाले हैं। अनीश का अर्थ है जिनका कोई स्वामी नहीं, और शाश्वतस्थिर वे हैं जो सदा अटल रहते हैं। भूशय नाम की एक व्याख्या के अनुसार राम रूप में लंका जाते समय उन्होंने समुद्रतट की भूमि पर शयन किया था। भूषण अपने अवतारों से पृथ्वी को सजाने वाले हैं और भूति समस्त ऐश्वर्य का कारण। विशोक शोक से परे हैं और शोकनाशन स्मरण मात्र से भक्तों का शोक मिटा देते हैं।
अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः ।
अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ॥ ६८ ॥
अर्थ: अर्चिष्मान की किरणों से सूर्य और चंद्र जैसे ग्रह प्रकाशित होते हैं। अर्चित सब लोकों में पूजित हैं और कुम्भ घड़े की तरह हैं, जिनके भीतर सारी सृष्टि समाई है। विशुद्धात्मा तीनों गुणों से परे शुद्ध आत्मा हैं और विशोधन स्मरण से पापों को धो देते हैं। अनिरुद्ध को कोई रोक नहीं सकता, अप्रतिरथ का कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं, प्रद्युम्न श्रेष्ठ तेज और धन वाले हैं, और अमितविक्रम का पराक्रम अपार है।
कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः ।
त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः ॥ ६९ ॥
अर्थ: कालनेमिनिहा ने कालनेमि नामक असुर का वध किया। वीर शूरवीर हैं और शौरि शूरकुल में जन्मे। शूरजनेश्वर इंद्र जैसे शूरवीरों के भी स्वामी हैं। त्रिलोकात्मा तीनों लोकों की आत्मा हैं और त्रिलोकेश उनके स्वामी। केशव नाम का एक अर्थ है कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव की शक्तियाँ उनके केश रूप हैं। केशिहा ने केशी दैत्य को मारा, और हरि पाप तथा अविद्या को हर लेने वाले हैं।
कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः ।
अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनञ्जयः ॥ ७० ॥
अर्थ: कामदेव वे हैं जिन्हें सब चाहते हैं, और कामपाल भक्तों की कामनाओं का पालन करने वाले हैं। कामी का अर्थ पूर्णकाम है और कान्त परम सुंदर। कृतागम ने वेद और शास्त्रों को प्रकट किया। अनिर्देश्यवपु का रूप शब्दों में नहीं बताया जा सकता। विष्णु सर्वव्यापी हैं, वीर श्रेष्ठ योद्धा हैं, और अनन्त देश तथा काल की सीमा से परे हैं। धनञ्जय नाम अर्जुन रूप से जुड़ा है, जिन्होंने दिग्विजय में बहुत धन जीता।
ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद्ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः ।
ब्रह्मविद्ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ॥ ७१ ॥
अर्थ: इस श्लोक के नाम “ब्रह्म” शब्द के इर्द-गिर्द हैं। ब्रह्मण्य तप, वेद और ज्ञान के हितैषी हैं। ब्रह्मकृत तप आदि करने वाले हैं। ब्रह्मा रूप में वे सृष्टि की रचना करते हैं, और ब्रह्म स्वयं परम तत्व हैं। ब्रह्मविवर्धन तप और ज्ञान को बढ़ाने वाले हैं। ब्रह्मवित वेद और उनके अर्थ को ठीक-ठीक जानते हैं। ब्राह्मण, ब्रह्मी और ब्रह्मज्ञ नाम उनके ज्ञान और वैदिक धर्म के स्वरूप को बताते हैं, और ब्राह्मणप्रिय को ब्राह्मण प्रिय हैं। परंपरा में कथा है कि उन्होंने हयग्रीव दैत्य को मारकर वेद वापस लिए थे।
महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः ।
महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ॥ ७२ ॥
अर्थ: महाक्रम के डग विराट हैं, जैसा वामन अवतार में दिखता है। महाकर्मा जगत की रचना जैसे महान कर्म करते हैं और महातेजा अत्यंत तेजस्वी हैं। महोरग वासुकि जैसे महान सर्प के रूप में भी हैं। महाक्रतु स्वयं महान यज्ञ हैं, महायज्वा लोकहित के लिए यज्ञ करने वाले हैं, और महायज्ञ तथा महाहवि का अर्थ है कि यज्ञ और उसकी आहुति भी वही हैं।
स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः ।
पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ॥ ७३ ॥
अर्थ: स्तव्य की सब स्तुति करते हैं, और स्तवप्रिय को स्तुति प्रिय है। स्तोत्र और स्तुति भी वही हैं, और स्तुति करने वाले स्तोता भी वही, क्योंकि सब कुछ उन्हीं का रूप है। रणप्रिय को रण यानी युद्ध प्रिय है। पूर्ण सभी शक्तियों से संपन्न हैं और पूरयिता भक्तों की मनोकामना पूरी करते हैं। पुण्य स्वयं पुण्य रूप हैं, पुण्यकीर्ति की कीर्ति सुनने वालों को पुण्य देती है, और अनामय रोग-रहित हैं।
मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः ।
वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ॥ ७४ ॥
अर्थ: मनोजव की गति मन के समान तीव्र है। तीर्थकर विद्याओं और वेद विद्या के उपदेशक हैं। वसुरेता सुवर्ण के समान तेजस्वी हैं, और वसुप्रद खुले हाथ से धन देते हैं। इस श्लोक में वसुप्रद दो बार आता है, जिसकी एक व्याख्या यह है कि वे धन के साथ मोक्ष रूप उत्कृष्ट फल भी देते हैं। वासुदेव वसुदेव के पुत्र हैं और जिनमें सब प्राणी बसते हैं। वसु सबमें समान भाव से रहते हैं, वसुमना का मन उदार है, और हवि आहुति रूप हैं।
सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः ।
शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ॥ ७५ ॥
अर्थ: सद्गति मोक्ष रूप श्रेष्ठ गति हैं। सत्कृति के कर्म श्रेष्ठ हैं और सत्ता अस्तित्व का रूप। सद्भूति सज्जनों को ऐश्वर्य देते हैं और सत्परायण सत्पुरुषों के परम आश्रय हैं। शूरसेन की सेना में हनुमान जैसे शूरवीर हैं। यदुश्रेष्ठ यदुवंश में प्रधान हैं और सन्निवास सज्जनों के निवास स्थान हैं। सुयामुन नाम यमुना के सुंदर तट पर गोप सखाओं के बीच रहने वाले श्रीकृष्ण की ओर संकेत करता है।
भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः ।
दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः ॥ ७६ ॥
अर्थ: भूतावास में सब प्राणी निवास करते हैं, और वासुदेव सब जीवों में आत्मा रूप से रहते हैं। सर्वासुनिलय सभी प्राणों के अंतिम आश्रय हैं। अनल अग्नि रूप हैं और उनकी शक्ति का अंत नहीं। दर्पहा अधर्म के मार्ग पर चलने वालों का घमंड तोड़ते हैं, जबकि दर्पद धर्म के मार्ग पर चलने वालों को गौरव देते हैं। दृप्त अपने आत्मानंद में मग्न हैं। दुर्धर को हृदय में धारण करना कठिन है, और अपराजित किसी से हारते नहीं।
विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान् ।
अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ॥ ७७ ॥
अर्थ: विश्वमूर्ति का रूप स्वयं विश्व है और महामूर्ति का स्वरूप विराट है। दीप्तमूर्ति प्रकाशमय हैं। अमूर्तिमान का अर्थ है कि वे निराकार भी हैं, क्योंकि उनका कोई कर्म-जन्य शरीर नहीं। अनेकमूर्ति अवतारों में अनेक रूप धारण करते हैं, और अव्यक्त इंद्रियों से प्रकट नहीं होते। शतमूर्ति सैकड़ों रूपों वाले हैं और शतानन सैकड़ों मुखों वाले।
एको नैकः सवः कः किं यत्पदमनुत्तमम् ।
लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ॥ ७८ ॥
अर्थ: एक का अर्थ है अद्वितीय, और नैक का अर्थ है कि माया से वे अनेक रूपों में दिखते हैं। सव वह यज्ञ हैं जिसमें सोम निकाला जाता है। क सुख स्वरूप ब्रह्म का नाम है, और किं वह परम तत्व है जिस पर चिंतन किया जाता है। उनका पद इतना श्रेष्ठ है कि उससे ऊपर कुछ नहीं, इसलिए वे अनुत्तम हैं। लोकबन्धु लोकों के हितैषी हैं और लोकनाथ उनके स्वामी। माधव लक्ष्मी के पति हैं, और भक्तवत्सल भक्तों पर स्नेह और दया रखते हैं।
सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी ।
वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः ॥ ७९ ॥
अर्थ: सुवर्णवर्ण का वर्ण सोने जैसा है और हेमाङ्ग का शरीर स्वर्ण जैसा कांतिमान। वराङ्ग के अंग श्रेष्ठ हैं और चन्दनाङ्गदी चंदन तथा बाजूबंद से सजे हैं। वीरहा धर्म की रक्षा के लिए असुर वीरों का वध करते हैं। विषम का अर्थ है जिनके समान कोई नहीं, और शून्य वे हैं जिन्हें किसी विशेषण में बाँधा नहीं जा सकता। घृताशी की कृपा सहज और निर्बाध बहती है। अचल कभी विचलित नहीं होते, फिर भी चल रूप में वायु और प्राणियों के रूप में गतिशील हैं।
अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक् ।
सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ॥ ८० ॥
अर्थ: अमानी में अभिमान नहीं है, जबकि मानद भक्तों को सम्मान देते हैं और उनमें अभिमान नहीं आने देते। मान्य सबके पूजनीय हैं। लोकस्वामी चौदह लोकों के स्वामी हैं और त्रिलोकधृक तीनों लोकों को धारण करते हैं। सुमेधा की बुद्धि श्रेष्ठ है और मेधज यज्ञ में प्रकट होते हैं। धन्य कृतार्थ और पुण्यवान हैं। सत्यमेधा की बुद्धि सत्य है, और धराधर अपने अंश से पृथ्वी को धारण करते हैं।
तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकशृङ्गो गदाग्रजः ॥ ८१ ॥
अर्थ: तेजोवृष सूर्य रूप से तेज की वर्षा करते हैं और द्युतिधर कांति धारण करते हैं। सर्वशस्त्रभृतां वर समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ हैं। प्रग्रह भक्तों के अर्पित पुष्प और पूजा को भली-भाँति स्वीकार करते हैं। निग्रह सबको अपने वश में रखते हैं और दुष्टों का दमन करते हैं। व्यग्र का अर्थ है कि वे भक्तों के लिए सदा तत्पर रहते हैं। नैकशृङ्ग नाम के पीछे कई व्याख्याएँ हैं, और गदाग्रज को परंपरा में मंत्र से भी पहले प्रकट होने वाला माना गया है।
चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः ।
चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात् ॥ ८२ ॥
अर्थ: इस श्लोक में “चार” की महिमा है। चतुर्मूर्ति के चार स्वरूप हैं और चतुर्बाहु चार भुजाओं में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करते हैं। चतुर्व्यूह के चार व्यूह रूप हैं। चतुर्गति चारों आश्रमों, वर्णों और वेदों की परम गति हैं। चतुरात्मा के अंतःकरण के चारों अंग, यानी मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त, राग-द्वेष से रहित हैं। चतुर्भाव धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के स्रोत हैं। चतुर्वेदवित् चारों वेदों के ज्ञाता हैं, और एकपात का अर्थ है कि यह पूरा जगत उनका केवल एक पाद है।
समावर्तोऽनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः ।
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा ॥ ८३ ॥
अर्थ: समावर्त संसार रूपी चक्र को भली-भाँति घुमाते हैं और सृष्टि का क्रम चलाते हैं। अनिवृत्तात्मा विषयों से परे हैं। दुर्जय को कोई जीत नहीं सकता, और दुरतिक्रम की आज्ञा का उल्लंघन सूर्य जैसे देव भी नहीं कर सकते। दुर्लभ कठिन भक्ति से ही मिलते हैं। दुर्गम को कठिनाई से जाना जाता है, और दुर्ग को भेद पाना कठिन है। दुरावास को चित्त में बसाना कठिन है, और दुरारिहा दुष्ट मार्ग वालों का नाश करते हैं।
शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः ।
इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ॥ ८४ ॥
अर्थ: शुभाङ्ग के अंग शुभ हैं और लोकसारङ्ग लोकों के सार। सुतन्तु की माया का विस्तार सुंदर है, और तन्तुवर्धन उस विस्तार को बढ़ाते हैं। इन्द्रकर्मा के कर्म इंद्र के समान हैं और महाकर्मा के कर्म महान। कृतकर्मा ने धर्मरूप कर्म किया है, और कृतागम ने वेद रूप आगम की रचना की है।
उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः ।
अर्को वाजसनः शृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी ॥ ८५ ॥
अर्थ: उद्भव जन्म नहीं लेते, बल्कि अवतरित होते हैं और सृष्टि की उत्पत्ति के कारण हैं। सुन्दर अत्यंत सुंदर हैं और सुन्द करुणामय। रत्ननाभ की नाभि रत्न जैसी सुंदर है और सुलोचन के नेत्र सुंदर। अर्क ब्रह्मा जैसे पूजनीयों के भी पूजनीय हैं। वाजसन याचकों को अन्न देते हैं। शृङ्गी ने प्रलय के समय सींग वाले मत्स्य का रूप लेकर पृथ्वी को धारण किया। जयन्त शत्रुओं को जीतने वाले हैं और सर्वविज्जयी सब कुछ जानने तथा सबको जीतने वाले।
सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः ।
महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः ॥ ८६ ॥
अर्थ: सुवर्णबिन्दु के अंग सोने जैसे सुंदर हैं। अक्षोभ्य राग-द्वेष और शत्रुओं से कभी विचलित नहीं होते। सर्ववागीश्वरेश्वर ब्रह्मा जैसे वाणी के स्वामियों के भी ईश्वर हैं। महाह्रद विशाल सरोवर के समान हैं, और महागर्त की माया गहरे गड्ढे जैसी पार करने में कठिन है। महाभूत तीनों कालों से परे हैं, और महानिधि श्रेष्ठ संपत्ति के भंडार हैं।
कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः ।
अमृताशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ॥ ८७ ॥
अर्थ: कुमुद पृथ्वी का भार उतारकर उसे आनंद देते हैं। कुन्दर कुंद पुष्प की तरह शुद्ध और सुंदर फल देते हैं, और कुन्द के अंग कुंद के समान सुंदर हैं। पर्जन्य बादल की तरह कामनाओं की वर्षा करते हैं और ताप हरते हैं। पावन स्मरण मात्र से पवित्र कर देते हैं। अनिल वायु के समान वेगवान हैं और उन्हें किसी प्रेरणा की आवश्यकता नहीं। अमृताश अमृत का पान करते हैं, और अमृतवपु का शरीर मृत्यु से परे है। सर्वज्ञ सब कुछ जानते हैं और सर्वतोमुख के नेत्र, सिर और मुख सब ओर हैं।
सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः ।
न्यग्रोधोऽदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः ॥ ८८ ॥
अर्थ: सुलभ समर्पित भक्ति से सहज ही मिल जाते हैं। सुव्रत श्रेष्ठ व्रत वाले हैं और सिद्ध की सिद्धि किसी पर निर्भर नहीं। शत्रुजित देवताओं के शत्रुओं को जीतते हैं और शत्रुतापन उन्हें तपाते हैं। न्यग्रोध नीचे की ओर उगकर भी सबसे ऊपर विराजमान हैं। उदुम्बर आकाश से भी ऊपर हैं। अश्वत्थ पीपल रूपी संसार-वृक्ष हैं। चाणूरान्ध्रनिषूदन ने चाणूर नामक वीर का वध किया।
सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः ।
अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः ॥ ८९ ॥
अर्थ: सहस्रार्चि की हज़ारों किरणें हैं। सप्तजिह्व अग्नि की सात जिह्वाओं वाले हैं और सप्तैधा सात दीप्तियों या समिधाओं वाले। सप्तवाहन के वाहन सूर्य के सात अश्व हैं। अमूर्ति निराकार हैं और अनघ पापरहित। अचिन्त्य चिंतन से भी परे हैं। भयकृत दुष्टों के लिए भय का कारण हैं, जबकि भयनाशन धर्मपालकों और भक्तों का भय मिटाते हैं।
अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् ।
अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः ॥ ९० ॥
अर्थ: अणु अत्यंत सूक्ष्म हैं और बृहत् महान से भी महान। कृश और स्थूल, दोनों रूप उन्हीं के हैं। गुणभृत् सत्व, रज और तम के अधिष्ठाता हैं, फिर भी निर्गुण होकर इन गुणों से परे हैं। अधृत को किसी ने धारण नहीं किया, और स्वधृत स्वयं अपने बल से स्थित हैं। स्वास्य का मुख अत्यंत सुंदर है। प्राग्वंश का वंश सबसे पहले हुआ, और वंशवर्धन अपने रचे संसार रूपी वंश को बढ़ाते हैं।
भारभृत्कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः ।
आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ॥ ९१ ॥
अर्थ: भारभृत् शेषनाग रूप में पृथ्वी का भार उठाते हैं। कथित का अर्थ है कि वेदों में उनका वर्णन है। योगी योगविद्या में पारंगत हैं और योगीश योगियों के भी स्वामी। सर्वकामद सब मनोकामनाएँ पूरी करते हैं। आश्रम संसार रूपी वन में भटकते जीवों के लिए विश्राम स्थल हैं। श्रमण अविवेकी और भक्त-विरोधियों को दुःख देने वाले हैं। क्षाम कल्प के अंत में सृष्टि को अपने भीतर लीन कर लेते हैं। सुपर्ण वेद रूपी सुंदर पत्तों वाले संसार-वृक्ष हैं। वायुवाहन वायु के भी प्रेरक हैं।
धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः ।
अपराजितः सर्वसहो नियन्ताऽनियमोऽयमः ॥ ९२ ॥
अर्थ: धनुर्धर नाम राम रूप का स्मरण कराता है, जिन्होंने महान धनुष धारण किया। धनुर्वेद धनुर्विद्या के ज्ञाता हैं। दण्ड उन लोगों के लिए दंड हैं जो दूसरों का दमन करते हैं। दमयिता दंड देने वाले हैं, और दम का अर्थ दंड का फल या आत्मसंयम है। अपराजित शत्रुओं से पराजित नहीं होते। सर्वसह सब कुछ सहने वाले हैं। नियन्ता सबको उनके कार्य में नियुक्त करते हैं। अनियम स्वयं किसी नियम से बँधे नहीं, और अयम के लिए कोई मृत्यु नहीं।
सत्त्ववान्सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः ।
अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियकृत्प्रीतिवर्धनः ॥ ९३ ॥
अर्थ: सत्त्ववान में शूरता और पराक्रम है, और सात्त्विक में सत्वगुण प्रधान है। सत्य स्वयं सत्य स्वरूप हैं और सत्यधर्मपरायण सत्य और धर्म में तत्पर रहते हैं। अभिप्राय वे हैं जिनकी ओर प्रलय में संसार जाता है और जिन्हें पुरुषार्थ चाहने वाले चाहते हैं। प्रियार्ह प्रिय वस्तु अर्पण करने के योग्य हैं और अर्ह पूजा के योग्य। प्रियकृत भजने वालों का प्रिय करते हैं, और प्रीतिवर्धन भक्तों का प्रेम बढ़ाते हैं।
विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः ।
रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ॥ ९४ ॥
अर्थ: विहायसगति का आश्रय आकाश है। ज्योति स्वयं प्रकाशित हैं और सुरुचि सुंदर कांति वाले। हुतभुक् यज्ञ की आहुतियाँ अग्नि रूप में ग्रहण करते हैं, और विभु सर्वव्यापक तथा तीनों लोकों के प्रभु हैं। रवि और विरोचन विविध प्रकार से सुशोभित होने वाले हैं। सूर्य शोभा को जन्म देते हैं और सविता समस्त जगत की उत्पत्ति के कारण हैं। रविलोचन के नेत्र स्वयं सूर्य हैं।
अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः ।
अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः ॥ ९५ ॥
अर्थ: अनन्त देश और काल की सीमा से परे हैं। हुतभुक् हवन की आहुतियों को ग्रहण करते हैं और भोक्ता सबके पालनकर्ता हैं। सुखद भक्तों को मोक्ष रूपी सुख देते हैं। नैकज धर्म की रक्षा के लिए बार-बार अवतार लेते हैं। अग्रज सृष्टि में सबसे पहले हिरण्यगर्भ रूप में प्रकट हुए। अनिर्विण्ण को किसी वस्तु की अप्राप्ति का खेद नहीं। सदामर्षी साधुओं के प्रति सदा क्षमाशील हैं। लोकाधिष्ठान तीनों लोकों के आधार हैं और अद्भुत अपने स्वरूप तथा कार्यों में अद्भुत।
सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः ।
स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्ति स्वस्तिभुक्स्वस्तिदक्षिणः ॥ ९६ ॥
अर्थ: सनात वे हैं जो काल से भी परे सदा से हैं, और सनातनतम ब्रह्मा आदि से भी अधिक पुरातन। कपिल देवहूति के पुत्र कपिल मुनि के रूप में प्रकट हुए। कपि सूर्य रूप में अपनी किरणों से जल का पान करते हैं। अव्यय अविनाशी हैं, और कुछ पाठों में यही नाम “अप्यय” रूप में आता है, जिसका अर्थ है कि प्रलय में सृष्टि उन्हीं में विलीन हो जाती है। स्वस्तिद भक्तों को मंगल देते हैं और स्वस्तिकृत केवल मंगल ही करते हैं। स्वस्ति स्वयं कल्याण रूप हैं। स्वस्तिभुक् कल्याण का भोग और रक्षा करते हैं, और स्वस्तिदक्षिण शीघ्र कल्याण करने में समर्थ हैं।
अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः ।
शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ॥ ९७ ॥
अर्थ: अरौद्र में रौद्रता, यानी क्रूरता और कोप, नहीं है। कुण्डली सूर्यमंडल जैसे कुंडल धारण करते हैं, और चक्री लोकों की रक्षा के लिए सुदर्शन चक्र धारण करते हैं। विक्रमी का पराक्रम सबसे विलक्षण है, और ऊर्जितशासन का शासन, यानी श्रुति और स्मृति का विधान, अत्यंत उत्कृष्ट है। शब्दातिग शब्दों से कहे नहीं जा सकते, फिर भी शब्दसह वेद उनका वर्णन करते हैं। शिशिर तीनों तापों से तपे जीवों को विश्राम और शीतलता देते हैं। शर्वरीकर नाम सृष्टि की शांति और विश्राम की ओर संकेत करता है।
श्लोक 98
अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणां वरः ।
विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥ ९८ ॥
अर्थ: अक्रूर में क्रूरता नहीं है और पेशल कर्म, मन तथा वाणी से सुंदर हैं। दक्ष कार्य में कुशल और शीघ्र हैं। दक्षिण सहृदय हैं, और क्षमिणांवर क्षमा करने वालों में श्रेष्ठ। विद्वत्तम ज्ञानियों में भी सबसे बड़े ज्ञानी हैं। वीतभय का सांसारिक भय बीत चुका है। पुण्यश्रवणकीर्तन का श्रवण और कीर्तन सुनने तथा गाने वाले का पुण्य बढ़ाता है।
उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः ।
वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः ॥ ९९ ॥
अर्थ: उत्तारण संसार सागर से पार उतारते हैं और मुक्ति देते हैं। दुष्कृतिहा पाप और दुष्टों का नाश करते हैं। पुण्य स्वयं पुण्य रूप हैं, और दुःस्वप्ननाशन बुरे स्वप्नों का नाश करते हैं। वीरहा और रक्षण तीनों लोकों की रक्षा करते हैं और भक्तों के रक्षक हैं। सन्त सन्मार्ग पर चलने वाले संत रूप हैं। जीवन प्राण रूप से सबको जीवित रखते हैं, और पर्यवस्थित सृष्टि को चारों ओर से व्याप्त करके स्थित हैं।
अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः ।
चतुरश्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ॥ १०० ॥
अर्थ: अनन्तरूप के रूप अनंत हैं और अनन्तश्री की संपदा अपार है। जितमन्यु ने क्रोध को जीत लिया है। भयापह भय को हरते हैं। चतुरश्र न्यायपूर्वक सबको कर्म के अनुसार फल देते हैं। गभीरात्मा का स्वभाव गंभीर है। विदिश विविध प्रकार के फल देने वाले हैं, व्यादिश इंद्र आदि को विविध आज्ञा देने वाले हैं, और दिश सबको उनके कर्मों का फल बताने तथा देने वाले हैं।
अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः ।
जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः ॥ १०१ ॥
अर्थ: अनादि का कोई आरंभ नहीं है। भूर्भुव पृथ्वी के आधार हैं और लक्ष्मी पृथ्वी की शोभा। सुवीर श्रेष्ठ वीर हैं, और रुचिराङ्गद सुंदर बाजूबंद धारण करते हैं। जनन जीवों को उत्पन्न करते हैं और जनजन्मादि जन्म लेने वाले जीवों के आदि कारण हैं। भीम दुष्टों के लिए भय का कारण हैं, और भीमपराक्रम का पराक्रम असुरों में भय जगाता है।
आधारनिलयोऽधाता पुष्पहासः प्रजागरः ।
ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ॥ १०२ ॥
अर्थ: आधारनिलय पाँचों महाभूतों, यानी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश, के भी आधार हैं। अधाता को किसी ने धारण नहीं किया। पुष्पहास का प्रपंच रूप में विकास फूल के खिलने जैसा है। प्रजागर सदा जागृत हैं और सब विषयों के ज्ञाता। ऊर्ध्वग सबसे ऊपर, यानी वैकुण्ठ में स्थित हैं। सत्पथाचार स्वयं सत्य मार्ग का आचरण करते हैं। प्राणद प्राण देने वाले हैं। प्रणव ॐकार स्वरूप हैं, और पण भक्तों के साथ व्यवहारशील रहने वाले हैं।
प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत्प्राणजीवनः ।
तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः ॥ १०३ ॥
अर्थ: प्रमाण स्वयं प्रमाण रूप और साक्षी हैं। प्राणनिलय में सारे प्राण और इंद्रियाँ लीन होती हैं। प्राणभृत् अन्न रूप से प्राणों का पोषण करते हैं, और प्राणजीवन जीवों के जीवन का आधार हैं। तत्त्व वह परम सत्य हैं जिसे अमृत और सत्य जैसे शब्द भी कहते हैं। तत्त्ववित् आत्मतत्त्व को यथावत जानते हैं और एकात्मा एक ही आत्मा हैं। जन्ममृत्युजरातिग जन्म, मृत्यु और बुढ़ापे से परे हैं।
भूर्भुवःस्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः ।
यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः ॥ १०४ ॥
अर्थ: भूर्भुवःस्वस्तरु का अर्थ है कि भू, भुवः और स्वः लोक उनका सार हैं। तार संसार सागर से भक्तों का उद्धार करते हैं। सविता समस्त लोकों के उत्पादक हैं, और प्रपितामह ब्रह्मा के भी पिता। यज्ञ स्वयं यज्ञ रूप हैं और यज्ञपति यज्ञों के स्वामी। यज्वा यजमान और यज्ञकर्ता के रूप में स्थित हैं। यज्ञाङ्ग यज्ञ ही जिनके अंग हैं, और यज्ञवाहन यज्ञों का फल देने वाले हैं।
यज्ञभृद्यज्ञकृद्यज्ञी यज्ञभुग्यज्ञसाधनः ।
यज्ञान्तकृद्यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ॥ १०५ ॥
अर्थ: यज्ञभृत् यज्ञ को धारण कर उसकी रक्षा करते हैं। यज्ञकृत् सृष्टि के आरंभ और अंत में यज्ञ करते हैं। यज्ञी यज्ञों के स्वामी हैं और यज्ञभुक् यज्ञ के भोक्ता। यज्ञसाधन के लिए यज्ञ ही उन्हें पाने का साधन है। यज्ञान्तकृत् यज्ञ का फल प्राप्त कराते हैं। यज्ञगुह्य यज्ञ के रहस्य हैं, जिसे केवल विद्वान ही जान पाते हैं। अन्न अन्न रूप हैं और अन्नाद अन्न का भोग करने वाले।
आत्मयोनिः स्वयंजातो वैखानः सामगायनः ।
देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ॥ १०६ ॥
अर्थ: आत्मयोनि स्वयं अपनी सृष्टि का कारण हैं, और स्वयंजात स्वयं प्रकट होते हैं। वैखान ने वराह रूप में पृथ्वी को खोदकर निकाला। सामगायन सामवेद का गान करते हैं। देवकीनन्दन देवकी के पुत्र हैं और स्रष्टा सम्पूर्ण लोकों के रचयिता। क्षितीश पृथ्वी के स्वामी हैं, और पापनाशन पापों का नाश करते हैं।
शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः ।
रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ॥ १०७ ॥
अर्थ: शंखभृत् ने पाञ्चजन्य नामक शंख धारण किया है। नन्दकी नन्दक नामक खड्ग धारण करते हैं। चक्री की आज्ञा से संसार-चक्र चलता है। शार्ङ्गधन्वा ने शार्ङ्ग नामक धनुष धारण किया है, और गदाधर कौमोदकी गदा के धारी हैं। रथाङ्गपाणि के हाथ में चक्र है। अक्षोभ्य को कोई विचलित नहीं कर सकता, और सर्वप्रहरणायुध सभी आयुधों के धारण करने वाले हैं।
वनमाली गदी शार्ङ्गी शङ्खी चक्री च नन्दकी ।
श्रीमान् नारायणो विष्णुर्वासुदेवोऽभिरक्षतु ॥ १०८ ॥
सर्वप्रहरणायुध ॐ नम इति ।
अर्थ: यह समापन प्रार्थना है। वनमाला पहनने वाले, गदा, शार्ङ्ग धनुष, शंख, चक्र और नन्दक खड्ग धारण करने वाले श्रीमान नारायण, जो विष्णु और वासुदेव हैं, हमारी रक्षा करें।
फलश्रुति: शास्त्र क्या कहता है?
स्तोत्र के अंत में फलश्रुति आती है, जिसमें पाठ के फल बताए गए हैं। इसके अनुसार जो भक्ति के साथ नित्य इसका पाठ या श्रवण करता है, उसे इस लोक और परलोक में अशुभ की प्राप्ति नहीं होती। भय, रोग और बंधन से मुक्ति की कामना करने वाले को उनसे मुक्ति का आश्वासन दिया गया है।
फलश्रुति यह भी कहती है कि पाठ करने वाले में यश, तेज, बल और स्थिर समृद्धि आती है, और भक्तों के मन में क्रोध, ईर्ष्या, लोभ और अशुभ बुद्धि नहीं रहती।
ये वर्णन शास्त्र और आस्था की परंपरा के अनुसार हैं। बहुत से भक्त पाठ से मन की शांति और एकाग्रता का अनुभव बताते हैं। लेकिन रोग की स्थिति में चिकित्सा उपचार नहीं छोड़ना चाहिए। पाठ को उपचार के साथ आस्था के सहारे के रूप में देखें, उसके विकल्प के रूप में नहीं।
अगर पूरा पाठ न हो सके तो?
यदि समय कम हो तो ध्यान श्लोक और पहले कुछ श्लोक पढ़ें और धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ाएँ। आप “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप कर सकते हैं, या “नारायण” और “राम” नाम का स्मरण कर सकते हैं, जिसे परंपरा में सहस्रनाम के समान बताया गया है। पाठ सुनना भी एक अच्छा उपाय है, क्योंकि शास्त्र में श्रवण का भी फल बताया गया है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. विष्णु सहस्रनाम में कितने नाम हैं?
इसमें कुल 1000 नाम हैं। कुछ नाम एक से अधिक बार भी आते हैं।
2. विष्णु सहस्रनाम किसने लिखा?
परंपरा के अनुसार इसकी रचना महर्षि वेदव्यास ने की, और यह महाभारत के अनुशासन पर्व का हिस्सा है।
3. विष्णु सहस्रनाम किसने किसे सुनाया?
इसे भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को सुनाया था।
4. क्या विष्णु सहस्रनाम रोज़ पढ़ सकते हैं?
हाँ, भक्ति के साथ इसके नित्य पाठ की परंपरा है।
5. संस्कृत न आए तो क्या करें?
देवनागरी लिपि में लिखा पाठ पढ़ें, किसी जानकार या प्रामाणिक ऑडियो से उच्चारण सीखें और हिंदी अर्थ साथ में पढ़ें।
6. क्या महिलाएँ भी इसका पाठ कर सकती हैं?
हाँ, श्रद्धा और भक्ति के साथ कोई भी इसका पाठ कर सकता है।
7. क्या इसे सुनने से भी फल मिलता है?
स्तोत्र की फलश्रुति में पाठ के साथ श्रवण का भी उल्लेख है।
निष्कर्ष
विष्णु सहस्रनाम केवल नामों की सूची नहीं, बल्कि ईश्वर के स्वरूप को समझने और स्मरण करने का मार्ग है। यदि आप इसे अर्थ के साथ, श्रद्धा से और नियमित रूप से पढ़ें, तो यह साधना मन को शांति और स्थिरता देने में सहायक हो सकती है।


















