सावन सोमवार Shiv Ji Ki Aarti 2026: सावन के महीने में शिवभक्त सुबह-शाम शिव मंदिरों में उमड़ पड़ते हैं, जलाभिषेक करते हैं और घंटों पूजा-अर्चना में लीन रहते हैं। लेकिन धार्मिक मान्यता के अनुसार, चाहे पूजा कितनी भी विधि-विधान से क्यों न की गई हो, अंत में आरती किए बिना उसे पूर्ण नहीं माना जाता। इसीलिए हर सावन सोमवार को पूजा के अंतिम चरण में अनुराधा पौडवाल ने गाई गई “ॐ जय शिव ओंकारा आरती” (Shiv Ji Ki Aarti) गाना अनिवार्य समझा जाता है। नीचे यह आरती पूरे बोल के साथ दी गई है, ताकि आप घर बैठे भी सही तरीके से इसका पाठ कर सकें।
पूजा से पहले पढ़ें शिव मंत्र
आरती शुरू करने से पहले भक्तगण अक्सर यह प्रसिद्ध मंत्र पढ़ते हैं, जो भगवान शिव के स्वरूप का वर्णन करता है:
कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानी सहितं नमामि॥
इस मंत्र का सरल अर्थ है – कपूर के समान गौर वर्ण वाले, करुणा के अवतार, संसार के सार तथा सर्पों की माला धारण करने वाले भगवान शिव को, जो सदैव हृदय-कमल में निवास करते हैं, माता पार्वती सहित मैं नमन करता हूं।
जय शिव ओंकारा आरती हिंदी में (Shiv Ji Ki Aarti lyrics in hindi)
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
एकानन चतुरानन पंचानन राजे।
हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
अक्षमाला बनमाला रुण्डमाला धारी।
चंदन मृगमद सोहे भाले शशिधारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।
सनकादिक ब्रह्मादिक भूतादिक संगे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धरता।
जगकर्ता जगभर्ता जगपालनकर्ता॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
काशी में विश्वनाथ विराजे नंदी ब्रह्मचारी।
नित उठ भोग लगावे मन के अभिलाषी॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
त्रिगुणस्वामी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्द्धांगी धारा॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
आरती में क्या छिपा है संदेश
ओम जय शिव ओंकारा (om jai shiv omkara) आरती की रचना स्वामी शिवानंद ने की थी, और इसमें भगवान शिव के अनेक रूपों- पंचमुखी स्वरूप, त्रिनेत्रधारी रूप, और ब्रह्मा-विष्णु-महेश की एकता- का सुंदर वर्णन मिलता है। हर पंक्ति में भगवान शिव के अलग-अलग स्वरूपों और उनके आभूषणों (रुद्राक्ष, चंद्रमा, त्रिशूल, कमंडल) का उल्लेख है, जो उनकी वैराग्य और शक्ति दोनों को एक साथ दर्शाता है। काशी विश्वनाथ का जिक्र इस आरती को और भी विशेष बना देता है, क्योंकि काशी को शिव जी की सबसे प्रिय नगरी माना जाता है।
आरती करने का सही तरीका
पूजा और जलाभिषेक पूर्ण होने के बाद, घी या तेल का दीपक जलाकर शिवलिंग या शिव प्रतिमा के सामने खड़े होकर यह आरती गाई जाती है। आरती के दौरान घंटी बजाना शुभ माना जाता है। आरती समाप्त होने पर दीपक को शिव जी के चरणों की ओर से घुमाते हुए परिवार के सभी सदस्यों को दिखाया जाता है, और अंत में प्रसाद वितरित किया जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
प्रश्न: सावन सोमवार पर आरती कब करनी चाहिए?
उत्तर: जलाभिषेक और मुख्य पूजा पूर्ण होने के बाद, पूजा के अंतिम चरण में आरती की जाती है।
प्रश्न: “ओम जय शिव ओंकारा” आरती किसने लिखी थी?
उत्तर: इस आरती की रचना स्वामी शिवानंद ने की थी, यह आज देशभर के शिव मंदिरों में सबसे अधिक गाई जाने वाली आरती है।
प्रश्न: क्या आरती के बिना पूजा अधूरी मानी जाती है?
उत्तर: हां, पारंपरिक मान्यता के अनुसार आरती के बिना पूजा और व्रत का पूर्ण फल नहीं मिलता।
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(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और परंपरागत स्रोतों पर आधारित है। हिन्दीसनातन इसकी सत्यता का दावा नहीं करता। पाठक इसे आस्था और परंपरा के रूप में लें।)













